Monday, 7 August 2017

शनि, राहु और केतु प्रसन्न करने के खास उपाय...




शनि के अनुचर हैं राहु और केतु। शरीर में इनके स्थान
नियुक्त हैं। सिर राहु है तो केतु धड़। यदि आपके गले
सहित ऊपर सिर तक किसी भी प्रकार की गंदगी या
खार जमा है तो राहु का प्रकोप आपके ऊपर मँडरा
रहा है और यदि फेफड़ें, पेट और पैर में किसी भी प्रकार
का विकार है तो आप केतु के शिकार हैं। राहु और केतु
की भूमिका एक पुलिस अधिकारी की तरह है जो
न्यायाधीश शनि के आदेश पर कार्य करते हैं। ‍शनि का
रंग नीला, राहु का काला और केतु का सफेद माना
जाता है। शनि के देवता भैरवजी हैं, राहु की
सरस्वतीजी और केतु के देवता भगवान गणेशजी है। शनि
का पशु भैंसा, राहु का हाथी और काँटेदार जंगली
चूहा तथा केतु का कुत्ता, गधा, सुअर और छिपकली है।
शनि का वृक्ष कीकर, आँक व खजूर का वृक्ष, राहु का
नारियल का पेड़ व कुत्ता घास और केतु का इमली का
दरख्त, तिल के पौधे व केला है। शनि शरीर के दृष्टि,
बाल, भवें, हड्डी और कनपटी वाले हिस्से पर, राहु सिर
और ठोड़ी पर और केतु कान, रीढ़, घुटने, लिंग और जोड़
पर प्रभाव डालता है।
राहु की मार : यदि व्यक्ति अपने शरीर के अंदर
किसी भी प्रकार की गंदगी पाले रखता है तो उसके
ऊपर काली छाया मंडराने लगती है अर्थात राहु के
फेर में व्यक्ति के साथ अचानक होने वाली घटनाएँ बढ़
जाती है। घटना-दुर्घटनाएँ, होनी-अनहोनी और
कल्पना-विचार की जगह भय और कुविचार जगह बना
लेते हैं। राहु के फेर में आया व्यक्ति बेईमान या
धोखेबाज होगा। राहु ऐसेव्यक्ति की तरक्की रोक
देता है। राहु का खराब होना अर्थात् दिमाग की
खराबियाँ होंगी, व्यर्थ के दुश्मन पैदा होंगे, सिर में
चोट लग सकती है। व्यक्ति मद्यपान या संभोग में
ज्यादा रत रह सकता है। राहु के खराब होने से गुरु भी
साथ छोड़ देता है। राहु के अच्छा होने से व्यक्ति में
श्रेष्ठ साहित्यकार, दार्शनिक,वैज्ञानिक या फिर
रहस्यमय विद्याओं के गुणों का विकास होता है।
इसका दूसरा पक्ष यह कि इसके अच्छे होने से राजयोग
भी फलित हो सकता है। आमतौर पर पुलिस या
प्रशासन में इसके लोग ज्यादा होते हैं।
केतु की मार : जो व्यक्ति जुबान और दिल से गंदा है
और रात होते ही जो रंग बदल देता है वह केतु का
शिकार बन जाता है। यदि व्यक्ति किसी के साथ
धोखा, फरेब, अत्याचार करता है तो केतु उसके पैरों से
ऊपर चढ़ने लगता है और ऐसे व्यक्ति के जीवन की
सारी गतिविधियाँ रुकने लगती है। नौकरी, धंधा,
खाना और पीना सभी बंद होने लगता है। ऐसा
व्यक्ति सड़क पर या जेल में सोता है घर पर नहीं।
उसकी रात की नींद हराम रहती है, लेकिन दिन में
सोकर वह सभी जीवन समर्थक कार्यों से दूर होता
जाता है। केतु के खराब होने से व्यक्ति पेशाब की
बीमारी, जोड़ों का दर्द, सन्तान उत्पति में रुकावट
और गृहकलह से ग्रस्त रहता है। केतु के अच्छा होने से
व्यक्ति पद, प्रतिष्ठा और संतानों का सुख उठाता है
और रात की नींद चैन से सोता है।
शनि की मार : पराई स्त्री के साथ रहना, शराब
पीना, माँस खाना, झूठ बोलना, धर्म की बुराई
करना या मजाक उड़ाना, पिता व पूर्वजों का
अपमान करना और ब्याज का धंधा करना प्रमुख रूप से
यह सात कार्य शनि को पसंद नहीं। उक्त में से जो
व्यक्ति कोई-सा भी कार्य करता है शनि उसके
कार्यकाल में उसके जीवन से शांति, सुख और समृद्धि
छिन लेता है। व्यक्ति बुराइयों के रास्ते पर चलकर खुद
बर्बाद हो जाता है। शनि उस सर्प की तरह है जिसके
काटने पर व्यक्ति की मृत्यु तय है। शनि के अशुभ
प्रभाव के कारण मकान या मकान का हिस्सा गिर
जाता है या क्षतिग्रस्त हो जाता है, नहीं तो कर्ज
या लड़ाई-झगड़े के कारण मकान बिक जाता है। अंगों
के बाल तेजी से झड़ जाते हैं। अचानक आग लग सकती
है। धन, संपत्ति का किसी भी तरह नाश होता है।
समय पूर्व दाँत और आँख की कमजोरी। शनि की
स्थिति यदि शुभ है तो व्यक्ति हर क्षेत्र में प्रगति
करता है। उसके जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट
नहीं होता। बाल और नाखून मजबूत होते हैं। ऐसा
व्यक्ति न्यायप्रीय होता है और समाज में मान-
सम्मान खूब रहता हैं।
बचाव का तरीका :
शनि के उपाय- सर्वप्रथम भैरवजी के मंदिर जाकरउनसे
अपने पापों की क्षमा माँगे। जुआ, सट्टा, शराब,
वैश्या से संपर्क, धर्म की बुराई, पिता-पूर्वजों का
अपमान और ब्याज आदि कार्यों से दूर रहें। शरीर के
सभी छिद्रों को प्रतिदिन अच्छे से साफ रखें। दाँत,
बाल और
नाखूनों की सफाई रखें। कौवे को प्रतिदिन रोटी
खिलाएँ। छायादान करें, अर्थात कटोरी में थोड़ा-
सा सरसो का तेल लेकर अपना चेहरा देखकर शनि
मंदिर में रख आएँ। अंधे,
अपंगों, सेवकों और सफाईकर्मियों से अच्छा व्यवहार
रखें। रात को सिरहाने पानी रखें और उसे सुबह कीकर,
आँक या खजूर के वृक्ष पर चढ़ा आएँ।
राहु के उपाय- सिर पर चोटी रख सकते हैं, लेकिन
किसी लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर। भोजन
भोजनकक्ष में ही करें। ससुराल पक्ष से अच्छे संबंध रखें।
रात को सिरहाने मूली रखें और उसे सुबह किसी मंदिर
में दान कर दें।
केतु के उपाय- संतानें केतु हैं। इसलिए संतानों से संबंध
अच्छे रखें। भगवान गणेश की आराधना करें। दोरंगी
कुत्ते को रोटी खिलाएँ। कान छिदवाएँ। कुत्ता भी
पाल सकते हैं, लेकिन किसी लाल किताब के
विशेषज्ञ से पूछकर।
राहु-केतु और शनि को प्रसन्न करने के खास उपाय :
शनि को प्रसन्न करने के लिए बताए गए खास उपायों
में से एक उपाय है, किसी कुत्ते को तेल चुपड़ी हुई रोटी
खिलाना। अधिकतर लोग प्रतिदिन कुत्ते को रोटी
तो खिलाते ही हैं ऐसे में यदि रोटी पर तेल लगाकर
कुत्ते को खिलाई जाए तो शनि के दोषों से मुक्ति
मिलती है।
कुत्ता शनिदेव का वाहन है और जो लोग कुत्ते को
खाना खिलाते हैं उनसे शनि अति प्रसन्न होते हैं।
शनि महाराज की प्रसन्नता के बाद व्यक्ति को
परेशानियों के कष्ट से मुक्ति मिल जाती है।
साढ़ेसाती हो या ढैय्या या कुंडली का अन्य कोई
दोष इस उपाय से निश्चित ही लाभ होता है।
कुत्ते को तेल चुपड़ी रोटी खिलाने से शनि के साथ
ही राहु-केतु से संबंधित दोषों का भी निवारण हो
जाता है। राहु-केतु के योग कालसर्प योग से पीड़ित
व्यक्तियों को यह उपाय लाभ पहुंचाता है। इसके
अलावा निम्न मंत्रों से भी पीड़ित जातकों को
अत्यंत फायदा पहुंचता है।
राहु मंत्र को अगर सिद्ध किया जाए तो राहु से
जुड़ी परेशानियां समाप्त होती हैं। ध्यान रहे कि
राहु मंत्र की माला का जाप 8 बार किया जाता
है।
राहु मंत्र-
ह्रीं अर्धकायं महावीर्य चंद्रादित्य विमर्दनम्।
सिंहिका गर्भ संभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्।
ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:।
ॐ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहु
प्रचोदयात्।
केतु मंत्र-
केतु मंत्र का जाप 8 बार किया जाता है।
ॐ पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम।।
ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:।
ॐ पद्मपुत्राय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो केतु:
प्रचोदयात्।

स्नान से समृद्धि

                                               





सुबह के स्नान को धर्म शास्त्र में चार उपनाम दिए है।

1  मुनि स्नान।
जो सुबह 4 से 5 के बिच किया जाता है।
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2  देव स्नान।
जो सुबह 5 से 6 के बिच किया जाता है।
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3  मानव स्नान।
जो सुबह 6 से 8 के बिच किया जाता है।
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4  राक्षसी स्नान।
जो सुबह 8 के बाद किया जाता है। 

▶मुनि स्नान सर्वोत्तम है।
▶देव स्नान उत्तम है।
▶मानव स्नान समान्य है।
▶राक्षसी स्नान धर्म में निषेध है।
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किसी भी मानव को 8 बजे के बाद स्नान नही करना चाहिए।
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मुनि स्नान .......
घर में सुख ,शांति ,समृद्धि, विध्या , बल , आरोग्य , चेतना , प्रदान करता है।
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देव स्नान ......
 आप के जीवन में यश , किर्ती , धन वैभव,सुख ,शान्ति, संतोष , प्रदान करता है।
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मानव स्नान.....
काम में सफलता ,भाग्य ,अच्छे कर्मो की सूझ ,परिवार में एकता , मंगल मय , प्रदान करता है।
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राक्षसी स्नान.....
 दरिद्रता , हानि , कलेश ,धन हानि , परेशानी, प्रदान करता है ।
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किसी भी मनुष्य को 8 के बाद स्नान नही करना चाहिए।
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पुराने जमाने में इसी लिए सभी सूरज निकलने से पहले स्नान करते थे।

खास कर जो घर की स्त्री होती थी। चाहे वो स्त्री माँ के रूप में हो,पत्नी के रूप में हो,बेहन के रूप में हो।
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घर के बडे बुजुर्ग यही समझाते सूरज के निकलने से पहले ही स्नान हो जाना चाहिए।

वास्तु विचार नैऋत्य कोण

                                            



आज हम बात करते है नैऋत्य कोण के बारे में।पीने का पानी कभी भी नैऋत्य कोण में नही रखना चाहिए इससे जल स्वादहीन हो जाता है।जल का कारक चन्द्रमा मन जाता है।नैऋत्य कोण का स्वामी राहु होता है।राहु के स्थान में चन्द्रमा होने से चंद्रमा दूषित हो जाता है ज्योतिष शास्त्र में ग्रहण की स्थिति बताई जाती है चन्द्रमा और राहु की युक्ति को।अगर आपका किचन नैऋत्य कोण में है तो उस रसोई में बनाने वाले पदार्थ या खाने में मधुरता का आभाव होगा।उस रसोई में बने खाने को खाके परिवार में रहने वालो का स्वस्थ्य ठीक नही रहेगा।गृहणी हमेसा गुस्से में रहेंगे। आपसी मतभेद हमेशा रहेगा।गृहणियों की मानसिक स्थिति ठीक नही रहेगी।पश्चिम और नैऋत्य दिशाओं से आने वाली किरणों से भोजन की मधुरता खत्म हो जायेगी। नैऋत्य कोण में अगर सेफ्टी टैंक हो तो अवश्य वहां नकरात्मक ऊर्जा रहेगी जिससे परिवार की सुख शांति धन ऐश्वर्य सब खत्म हो जायेगा।गृहस्वामी जितना धन भी अर्जित करेंगे सब व्यथ होता जायेगा।कुछ भी सुख नही मिलेगा।नैऋत्य कोण में कुछ न हो यहाँ केवल अनावश्यक चीज़े रख सकते है।उचित उपाय करके समस्या से निकाला जा सकताहैं

राहु द्वारा निर्मित शुभ योग

                                 


अष्टलक्ष्मी योग -
वैदिक ज्योतिष में राहु नैसर्गिक पापी ग्रह के रूप में जाना जाता है.इस ग्रह की अपनी कोई राशि नहीं है अत: जिस राशि में होता है उस राशि के स्वामी अथवा भाव के अनुसार फल देता है.राहु जब छठे भाव में स्थित होता है और केन्द्र में गुरू होता है तब यह अष्टलक्ष्मी योग नामक शुभ योग का निर्माण करता है.  अष्टलक्ष्मी योग में राहु अपना पाप पूर्ण स्वभाव त्या ....?गकर गुरू के समान उत्तम फल देता है. अष्टलक्ष्मी योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है वह व्यक्ति ईश्वर के प्रति आस्थावान होता है.इनका व्यक्तित्व शांत होता है.इन्हें यश और मान सम्मान मिलता है.लक्ष्मी देवी की इनपर कृपा रहती है.
लग्न कारक योग -
राहु द्वारा निर्मित शुभ योगों में लग्न कारक योग  का नाम भी प्रमुख है. लग्न कारक योग  मेष, वृष एवं कर्क लग्न वालों की कुण्डली में तब बनता है जबकि राहु द्वितीय, नवम अथवा दशम भाव में नहीं होता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में लग्नकारक योग  उपस्थित होता है उसे राहु की अशुभता का सामना नहीं करना होता है. राहु इनके लिए शुभ कारक होता है जिससे दुर्घटना की संभावना कम रहती है.स्वास्थ्य उत्तम रहता है.आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है एवं सुखी जीवन जीते हैं.
परिभाषा योग -
जिस व्यक्ति की कुण्डली में राहु परिभाषा योगका निर्माण करता है.वह व्यक्ति राहु के कोप से मुक्त रहता है.यह योग जन्मपत्री में तब निर्मित होता है जब राहु लग्न में स्थित हो अथवा तृतीय, छठे या एकादश भाव में उपस्थित हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो.राहु का परिभाषा योग  व्यक्ति को आर्थिक लाभ देता है.स्वास्थ्य को उत्तम बनाये रखता है.इस योग से प्रभावित व्यक्ति के कार्य आसानी से बन जाते हैं.
कपट योग -
दो पापी ग्रह राहु और शनि जब जन्मपत्री में क्रमश: एकादश और षष्टम में उपस्थित होते हैं तो कपट योग बनता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में कपट योग  निर्मित होता है वह व्यक्ति अपने स्वार्थ हेतु किसी को भी धोखा देने वाला होता है .इनपर विश्वास करने वालों को पश्चाताप करना होता है.सामने भले ही लोग इनका सम्मान करते हों परंतु हुदय में इनके प्रति नीच भाव ही रहता है.
पिशाच योग -
पिशाच योग  राहु द्वारा निर्मित योगों में यह नीच योग है.पिशाच योग  जिस व्यक्ति की जन्मपत्री में होता है वह प्रेत बाधा का शिकार आसानी से हो जाता है.इनमें इच्छा शक्ति की कमी रहती है.इनकी मानसिक स्थिति कमज़ोर रहती है, ये आसानी से दूसरों की बातों में आ जाते हैं.इनके मन में निराशात्मक विचारों का आगमन होता रहता है.कभी कभी स्वयं ही अपना नुकसान कर बैठते हैं.
चांडाल योग -
चांडाल योग गुरू और राहु की युति से निर्मित होता है. चांडाल योग  अशुभ ग्रह के रूप में माना जाता है. चांडाल योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में निर्मित होता है उसे राहु के पाप प्रभाव को भोगना पड़ता है. चांडाल योग में आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है.नीच कर्मो के प्रति झुकाव रहता है.मन में ईश्वर के प्रति आस्था का अभाव रहता है.

जाप आदि में कोन सी माला सर्वोतम है ?



भगवान की पूजा के लिए मंत्र जप सर्वश्रेष्ठ उपाय है और पुराने समय से ही बड़े-बड़े तपस्वी, साधु-संत इस उपाय को अपनाते रहे हैं। जप के लिए माला की आवश्यकता होती है और इसके बिना मंत्र जप का फल प्राप्त नहीं हो पाता है।
रुद्राक्ष से बनी माला मंत्र जप के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। रुद्राक्ष को महादेव का प्रतीक माना गया है। रुद्राक्ष में सूक्ष्म कीटाणुओं का नाश करने की शक्ति भी होती है। साथ ही, रुद्राक्ष वातावरण में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा को ग्रहण करके साधक के शरीर में पहुंचा देता है।

पुण्यदायक नहीं संख्याहीन मंत्रों के जप



संख्याहीन मंत्रों के जप से नहीं मिलता है पूर्ण पुण्य
शास्त्रों में लिखा है कि-
बिना दमैश्चयकृत्यं सच्चदानं विनोदकम्।
असंख्यता तु यजप्तं तत्सर्व निष्फलं भवेत्।।
इस श्लोक का अर्थ है कि भगवान की पूजा के लिए कुश का आसन बहुत जरूरी है, इसके बाद दान-पुण्य जरूरी है। साथ ही, माला के बिना संख्याहीन किए गए मंत्र जप का भी पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता है। अत: जब भी मंत्र जप करें, माला का उपयोग अवश्य करना चाहिए।
मंत्र जप के लिए उपयोग की जाने वाली माला रुद्राक्ष, तुलसी, स्फटिक, मोती या नगों से बनी होती है। यह माला बहुत चमत्कारी प्रभाव रखती है। ऐसी मान्यता है कि किसी मंत्र का जप इस माला के साथ करने पर दुर्लभ कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।

माला में किसे कहते हैं सुमेरू.....




माला के दानों से मालूम हो जाता है कि मंत्र जप की कितनी संख्या हो गई है। जप की माला में सबसे ऊपर एक बड़ा दाना होता है जो कि सुमेरू कहलाता है। सुमेरू से ही जप की संख्या प्रारंभ होती है और यहीं पर खत्म भी। जब जप का एक चक्र पूर्ण होकर सुमेरू दाने तक पहुंच जाता है तब माला को पलटा लिया जाता है। सुमेरू को लांघना नहीं चाहिए।
जब भी मंत्र जप पूर्ण करें तो सुमेरू को माथे पर लगाकर नमन करना चाहिए। इससे जप का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

108 की ज्योतिषय मान्यता




ज्योतिष के अनुसार ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 भागों के नाम मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन 12 राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अत: ग्रहों की संख्या 9 का गुणा किया जाए राशियों की संख्या 12 में तो संख्या 108 प्राप्त हो जाती है। माला के दानों की संख्या 108 संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करती है । एक अन्य मान्यता के अनुसार ऋषियों ने में माला में 108 दाने रखने के पीछे ज्योतिषी कारण बताया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुल 27 नक्षत्र बताए गए हैं। हर नक्षत्र के 4 चरण होते हैं और 27 नक्षत्रों के कुल चरण 108 ही होते हैं। माला का एक-एक दाना नक्षत्र के एक-एक चरण का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए किया जाता है माला का उपयोग जो भी व्यक्ति माला की मदद से मंत्र जप करता है, उसकी मनोकामनएं बहुत जल्द पूर्ण होती हैं। माला के साथ किए गए जप अक्षय पुण्य प्रदान करते हैं। मंत्र जप निर्धारित संख्या के आधार पर किए जाए तो श्रेष्ठ रहता है। इसीलिए माला का उपयोग किया जाता है।

माला में 108 दाने, क्यों होते है क्यों करते है मंत्र जाप के लिए माला का प्रयोग ?




हिन्दू धर्म में हम मंत्र जप के लिए जिस माला का उपयोग करते है, उस माला में दानों की संख्या 108 होती है। शास्त्रों में इस संख्या 108 का अत्यधिक महत्व होता है । माला में 108 ही दाने क्यों होते हैं, इसके पीछे कई धार्मिक, ज्योतषिक  और वैज्ञानिक मान्यताएं हैं। आइए हम यहां जानते है ऐसी ही चार मान्यताओ के बारे में तथा साथ ही जानेंगे आखिर क्यों करना चाहिए मन्त्र जाप के लिए माला का प्रयोग।
सूर्य की एक-एक कला का प्रतीक होता है माला का एक-एक दाना

एक मान्यता के अनुसार माला के 108 दाने और सूर्य की कलाओं का गहरा संबंध है। एक वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता है और वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छह माह उत्तरायण रहता है और छह माह दक्षिणायन। अत: सूर्य छह माह की एक स्थिति में 108000 बार कलाएं बदलता है।

इसी संख्या 108000 से अंतिम तीन शून्य हटाकर माला के 108 मोती निर्धारित किए गए हैं। माला का एक-एक दाना सूर्य की एक-एक कला का प्रतीक है। सूर्य ही व्यक्ति को तेजस्वी बनाता है, समाज में मान-सम्मान दिलवाता है। सूर्य ही एकमात्र साक्षात दिखने वाले देवता हैं, इसी वजह से सूर्य की कलाओं के आधार पर दानों की संख्या 108 निर्धारित की गई है।

माला में 108 दाने रहते हैं। इस संबंध में शास्त्रों में दिया गया है कि...
"षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकं विशांति।
एतत् संख्यान्तितं मंत्रं जीवो जपति सर्वदा।।"
इस श्लोक के अनुसार एक पूर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति दिनभर में जितनी बार सांस लेता है, उसी से माला के दानों की संख्या 108 का संबंध है। सामान्यत: 24 घंटे में एक व्यक्ति करीब 21600 बार सांस लेता है। दिन के 24 घंटों में से 12 घंटे दैनिक कार्यों में व्यतीत हो जाते हैं और शेष 12 घंटों में व्यक्ति सांस लेता है 10800 बार।

इसी समय में देवी-देवताओं का ध्यान करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर यानी पूजन के लिए निर्धारित समय 12 घंटे में 10800 बार ईश्वर का ध्यान करना चाहिए, लेकिन यह संभव नहीं हो पाता है। इसीलिए 10800 बार सांस लेने की संख्या से अंतिम दो शून्य हटाकर जप के लिए 108 संख्या निर्धारित की गई है। इसी संख्या के आधार पर जप की माला में 108 दाने होते हैं।

जय श्री कृष्ण


भारतीय ज्योतिष और मंत्र विज्ञान



भारतीय ज्योतिष और मंत्र विज्ञान में जीवन की आम समस्याओं के लिए बेहद प्रभावशाली समाधान दिए गए हैं। यदि आप को किसी वस्तु या व्यक्ति से डर लगता है तो एक साधारण से दिखने वाले परन्तु बेहद शक्तिशाली मंत्र का केवल मात्र 7 बार जप करना आपके डर को हमेशा के लिए दूर कर देगा। इस मंत्र के स्मरण मात्र से डर भाग जाता है, और अकस्मात आई बाधाओं का निवारण होता है। जब भी किसी प्रकार के कोई पशुजन्य या दूसरे तरह से प्राणहानि आशंका हो तब इस मंत्र का 7 बार जाप करना चाहिए। इस प्रयोग के लिए मात्र मंत्र याद होना जरूरी है। मंत्र कंठस्थ करने के बाद केवल 7 बार शुद्ध जाप करें व चमत्कार देंखे!

इस मंत्र जाप से दिखने लगता है भूत, भविष्य, वर्तमान




अगर इस मंत्र का एक हजार बार बिना रूके लगातार जाप कर लिया जाए तो व्यक्ति की स्मरण शक्ति विश्व के उच्चतम स्तर तक हो जाती है तथा वह व्यक्ति परम मेधावी बन जाता है! अगर इस मंत्र का बिना रूके लगातार 10,000 बार जप कर लिया जाए तो उसे त्रिकाल दृष्टि (भूत, वर्तमान, भविष्य का ज्ञान) की प्राप्ति हो जाती है! अगर इस मंत्र का बिना रूके लगातार एक लाख बार, रूद्राक्ष की माला के साथ, लाल वस्त्र धारण करके तथा लाल आसान पर बैठकर, उत्तर दिशा की और मुख करके शुद्ध जाप कर लिया जाये, तो उस व्यक्ति को खेचरत्व एवं भूचरत्व की प्राप्ति हो जायेगी!
मंत्र इस प्रकार है
ओम हं ठ ठ ठ सैं चां ठं ठ ठ ठ ह्र: ह्रौं ह्रौं ह्रैं क्षैं क्षों क्षैं क्षं ह्रौं ह्रौं क्षैं ह्रीं स्मां ध्मां स्त्रीं सर्वेश्वरी हुं फट् स्वाहा