Friday, 23 August 2019

दरिद्रता दूर सरल उपायों से



प्रत्येक व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा धन कमाने का हरसंभव प्रयास करता है। इन प्रयासों में कुछ व्यक्ति सफ हो जाते हैं और कुछ सफल नहीं हो पाते। जो सफल नहीं हो पाते वे और प्रयास करते हैं। हम आपको यहां कुछ ऎसे सरल उपाय बता रहें जिनकों करने से फल अवश्य प्राप्त होगा।

1. प्रत्येक गुरूवार को तुलसी के पौधे में दूध अर्पित करने से आर्थिक संपन्नता में वृद्धि होती है।

2. शुक्लपक्ष की पंचमी को घर में श्रीसूक्त की ऋचाओं के साथ आहुति देने से भी दरिद्रता दूर होती है।

3. भोजन करने से पहले गाय, कुत्ते या कौवे के लिए एक रोटी निकाल दें। ऎसा करने से आपको कभी भी आर्थिक समस्याओं का सामना नहीं करना पडेगा।

4. महीने के पहले बुधवार को रात में कच्ची हल्दी की गांठ बांधकर भगवान कृष्ण को अर्पित करें। अगले दिन उसे पीले धागे में बांधकर अपनी दाहिनी भुजा में बांध लें।

5. गूलर की जड को कपडे में लपेटकर, चांदी के कवच में डाल के गले में पहनने से भी आर्थिक संपन्नता आती है।

6. अपनी तिजारी में 9 लक्ष्मीकारक कौडियां और एक तांबे का सिक्का रखने से आपकी तिजोरी में धन हमेशा भरा रहेगा।

7. नियमित रूप से केले के पेड में जल अर्पित करने और घी का दीपक जलाने से दरिद्रता दूर होती है।

8. शनिवार को अपने पलंग के नीचे एक बर्तन में सरसों का तेल रखें। अगले दिन उस तेल में उडद की दाल के गुलगुले बनाकर कुत्तों और गरीबों को खिलाने से गरीबी दूर होती है और लक्ष्मी का आगमन होता है।
ये उपाय श्रद्धापूवक करने पर आपको कुछ ही समय में इसके अच्छे परिणाम मिलने लग जाएंगे

दिन के अनुसार घर में लाएं ये चीज

अगर बिगड़ रहे सारे काम तो हर दिन के अनुसार घर लाएं ये चीज, फिर निश्चित होगा फायदा
माना जाता है कि जिस तरह हर दिन का संबंध किसी न किसी खास भगवान से होता है ठीक उसी तरह हर भगवान का संबंध भी किसी खास रंग से होता है। अगर हर दिन के अनुसार संबंधित खास रंग की या कोई खास वस्तु घर लाकर रख दी जाए तो आपके बिगड़े काम बन सकते हैं। अगर कई कोशिशों के बाद भी किसी कार्य में सफलता नहीं मिल रही है तो आप इसे जरूर पढ़ें।

1. शनि देवता को स‍मर्पित इस दिन के लिए नीला या काला रंग खास होता है। यह रंग मन के उतार चढ़ाव का होता है। शनिवार को नीले या काले रंग की कोई तस्‍वीर या शो पीस सीढि़यों के आस पास रखें।

2. सोमवार शिवजी का दिन है इसलिए इस दिन सफेद रंग शुभ माना जाता है। अगर लगातार किसी काम में असफलता मिल रही है तो सोमवार को सफेद रंग की कोई मूर्ति घर के हॉल में लाकर रख दें।

3. मंगलवार हनुमान जी का दिन होता है। इस दिन का विशेष रंग ऑरेंज या लाल होता है। अगर इस दिन के लिए घर के मंदिर में लाल या ऑरेंज रंग का कोई शो पीस घर की दक्षिण दिशा में लाकर रखना बेहद शुभ होता है।

4. बुधवार गणेश भगवान का दिन है, जिन्‍हें दूर्वा सबसे ज्‍यादा प्रिय है। इसलिए इस दिन हरे रंग की कोई तस्‍वीर लाकर घर के मेनगेट के पास या सामने स्‍थापित करें।

5. गुरूवार बृहस्‍पति देव का दिन है। इस दिन पीले रंग का महत्‍व होता है। इस दिन पीले रंग की कोई भी वस्‍तु घर के कीचन में कहीं भी रख दें। ऐसा करने से तरक्‍की होगी।

6. शुक्रवार देवी का दिन होता है इसलिए इस दिन रंगों का मिक्‍स या प्रिंटेड कपड़ो का होता है। इस दिन विशेष रूप से गुलाबी और रंग बिरंगे प्रिंट वाले कपड़े या चंनरी घर के मंदिर में रखें।

7. रविवार सूर्यदेव का दिन होता है इस दिन गुलाबी सुनहरे और संतरी रंग का विशेष म‍हत्‍व है। रविवार को इन रंगो में से किस 1 रंग की कोई भी वस्‍तु लाकर बच्‍चों के कमरे में रख दें।

Wednesday, 15 May 2019

ग्रहों के दोष दूर करने के लिए मोर पंख के उपाय



उपाय= यदि आप कुंडली में स्थित ग्रहों के बुरे प्रभाव दूर करना चाहते हैं या आपको मंगल शनि या राहु केतु बार-बार परेशान करते हों तो मोर पंख को 21 बार मंत्र सहित पानी के छीटे दीजिए। इसके बाद मोर पंख को घर में किसी श्रेष्ठ स्थान पर स्थापित कीजिए। यहां जानिए किस ग्रह के लिए कौन सा मंत्र जपना चाहिए...

(1)-   सूर्य के लिए उपाय--
रविवार के दिन नौ मोर पंख ले कर आएं और पंख के नीचे मैरून रंग का धागा बांध लेँ। इसके बाद एक थाली में पंखों के साथ नौ सुपारियां रखें गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें।
 ऊँ सूर्याय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
- दो नारियल सूर्य भगवान को अर्पित करें।

(2)-   चंद्र के लिए उपाय
सोमवार को आठ मोर पंख ले कर आएं, पंख के नीचे सफेद रंग का धागा बांध लेँ। इसके बाद एक थाली में पंखों के साथ आठ सुपारियां भी रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें।
ऊँ सोमाय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
- पांच पान के पत्ते चंद्रमा को अर्पित करें। बर्फी का प्रसाद चढ़ाएं ।

(3)-   मंगल के लिए उपाय
मंगलवार को सात मोर पंख ले कर आएं, पंख के नीचे लाल रंग का धागा बांध लेँ। इसके बाद एक थाली में पंखों के साथ सात सुपारियां रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें...
ऊँ भू पुत्राय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
- दो पीपल के पत्तों पर चावल रख कर मंगल देव को अर्पित करें। बूंदी का प्रसाद चढ़ाएं।

(4)-   बुध के लिए उपाय
बुधवार को छ: मोर पंख ले कर आएं। पंख के नीचे हरे रंग का धागा बांध लेँ। एक थाली में पंखों के साथ छ: सुपारियां रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें।
ऊँ बुधाय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
- जामुन बुद्ध ग्रह को अर्पित करें। केले के पत्ते पर रखकर मीठी रोटी का प्रसाद चढ़ाएं।

(5)-   गुरु के लिए उपाय
गुरुवार को पांच मोर पंख ले कर आएं। पंख के नीचे पीले रंग का धागा बांध लेँ। एक थाली में पंखों के साथ पांच सुपारियां रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें।
ऊँ ब्रहस्पते नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
- ग्यारह केले बृहस्पति देवता को अर्पित करें।                       -  बेसन का प्रसाद बना कर चढ़ाएं।

(6)-   शुक्र के लिए उपाय--
शुक्रवार को चार मोर पंख ले कर आएं। पंख के नीचे गुलाबी रंग का धागा बांध लेँ। एक थाली में पंखों के साथ चार सुपारियां रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें।
ऊँ शुक्राय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
- तीन मीठे पान शुक्र देवता को अर्पित करें।                -  गुड़-चने का प्रसाद बना कर चढ़ाएं।

(7)-   शनि के लिए उपाय
शनिवार को तीन मोर पंख ले कर आएं। पंख के नीचे काले रंग का धागा बांध लेँ। एक थाली में पंखों के साथ तीन सुपारियां रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें !
ऊँ शनैश्वराय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
- तीन मिटटी के दिये तेल सहित शनि देवता को अर्पित करें।        -  गुलाब जामुन या प्रसाद बना कर चढ़ाएं ।

(8)-   राहु के लिए उपाय--
शनिवार को सूर्य उदय से पूर्व दो मोर पंख ले कर आएं। पंख के नीचे भूरे रंग का धागा बांध लेँ। एक थाली में पंखों के साथ दो सुपारियां रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें !
ऊँ राहवे नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
- चौमुखा दिया जला कर राहु को अर्पित करें।               -    कोई भी मीठा प्रसाद बना कर चढ़ाएं।

(9)-   केतु के लिए उपाय--
शनिवार को सूर्य अस्त होने के बाद एक मोर पंख ले कर आएं। पंख के नीचे स्लेटी रंग का धागा बांध लेँ। एक थाली में पंख के साथ एक सुपारी रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें।
ऊँ केतवे नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
- पानी के दो कलश भर कर राहु को अर्पित करें।        - फलों का प्रसाद चढ़ाएं।                                         घर का द्वार यदि वास्तु के विरुद्ध हो तो द्वार पर तीन मोर पंख स्थापित करें।

Tuesday, 14 May 2019

व्यापार सफलता के चमत्कारी उपाय

व्यापार में सफलता के चमत्कारी उपाय, तेजी से बढ़ने लगेगा कारोबार ....

आज के समय में जहाँ अपने करियर को लेकर अधिकांश युवा किसी ना किसी प्रोफेशनल कोर्स को करने के बाद एक अच्छी नौकरी या तो कुछ लोग अपना स्वतंत्र व्यापार करने में ही रुचि रखते हैं,

वैसे भी किसी न किसी बिज़नेस में ही अपना करियर बानाना बहुत से लोगों की पहली पसंद होती है परन्तु कुछ लोग अपने बिजनेस में सफल हो पाते हैं तो बहुत से लोगो को लम्बे समय तक संघर्ष करने पर भी सफलता

नहीं मिलती और खर्च किया गया धन भी बेकार चला जाता है वास्तव में किसी व्यक्ति को व्यापार में सफलता मिलेगी या नहीं यह हमारी जन्मकुंडली में बने कुछ विशेष ग्रह-योगों पर निर्भर करता है और इस एक उपाय से आपका कारोबार तेजी से दिनों दिन बढ़ने लगेगा ।

व्यापार में सफलता के योग ....
1- यदि कुंडली में सप्तमेश सप्तम भाव में हो या सप्तम भाव पर सप्तमेश की दृष्टि हो तो बिजनेस में सफलता मिलती है ।

2- सप्तमेश स्व या उच्च राशि में होकर शुभ भाव (केंद्र-त्रिकोण आदि) में हो तो बिजनेस के अच्छे योग होते हैं ।

3- यदि लाभेश लाभ स्थान में ही स्थित हो तो व्यापार में अच्छी सफलता मिलती है ।

4- लाभेश की लाभ स्थान पर दृष्टि हो तो व्यापार में सफलता मिलती है ।

5- यदि लाभेश दशम भाव में और दशमेश लाभ स्थान में हो तो अच्छा व्यापारिक योग होता है ।

6- दशमेश का भाग्येश के साथ राशि परिवर्तन भी व्यापार में सफलता देता है ।

7- यदि धनेश और लाभेश का योग शुभ स्थान पर हो या धनेश और लाभेश का राशि परिवर्तन हो रहा हो तो भी व्यापार में सफलता मिलती है ।

8- सप्तमेश यदि मित्र राशि में शुभ भावों में स्थित हो तो भी बिजनेस में जाने का योग होता है ।

9- यदि सप्तमेश और दशमेश का राशि परिवर्तन हो अर्थात सप्तमेश दशम भाव में और दशमेश सप्तम भाव में हो तो भी बिजनेस में सफलता मिलती है ।

10- बुध स्व या उच्च राशि (मिथुन, कन्या) में होकर शुभ भावों में हो तो बिजनेस में जाने का अच्छा योग होता है।

11- बुध यदि शुभ स्थान केंद्र-त्रिकोण में मित्र राशि में हो और सप्तम भाव, सप्तमेश अच्छी स्थिति में हो तो भी बिजनेस में सफलता मिल जाती है।

12- यदि लाभेश (ग्यारहवे भाव का स्वामी) पाप भाव (6,8,12) में हो तो ऐसे में बिजनेस में संघर्ष की स्थिति रहती है ।

13- कुंडली के एकादश भाव में किसी पाप योग (ग्रहण योग, गुरुचांडाल योग आदि) का बनना भी बिजनेस में संघर्ष उत्पन्न करके सफलता को कम करता है ।

14- कुंडली में सप्मेश का पाप भाव या नीच राशि में होना भी बिजनेस के क्षेत्र में संघर्ष देता है ।

अगर किसी का व्यापार ठीक से नहीं चल रहा तो वे इस एक उपाय को अवश्य करें, इसस आपके व्यापार कारोबार में तेजी से वृद्धि होने लगती हैं ।

- प्रति दिन हनुमान जी के दर्शन करें एवं सुबह शाम श्री हनुमान चालीसा का पाठ जरूर करें एवं दोनों समय घी का दीपक भी जलाये, इससे अंदर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म होने लगेगी और कुछ ही दिनों आपका कारोबार में वृद्धि होने लगेगी ।

और ज्यादा जानकारी समाधान और उपाय या रत्न या किसी भी प्रकार की विधि या मंत्र प्राप्ति के लिए संपर्क करें और समाधान प्राप्त करें ...
सेवक बाबा सिद्ध सुलखन गुगा वीर जी

समाधान शुल्क - 2100 रु

Sunday, 12 May 2019

गोत्र का अर्थ



गोत्र का अर्थ है कि वह कौन से ऋषिकुल का है या उसका जन्म किस ऋषिकुल से सम्बन्धित है । किसी व्यक्ति की वंश-परम्परा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है।

हम सभी जानते हें की हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान है, इस प्रकार से जो जिस ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया ।

विश्‍वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतम:।
अत्रिवर्सष्ठि: कश्यपइत्येतेसप्तर्षय:॥
सप्तानामृषी-णामगस्त्याष्टमानां
यदपत्यं तदोत्रामित्युच्यते॥

विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है।

इस तरह आठ ऋषियों की वंश-परम्परा में जितने ऋषि (वेदमन्त्र द्रष्टा) आ गए वे सभी गोत्र कहलाते हैं। और आजकल ब्राह्मणों में जितने गोत्र मिलते हैं वह उन्हीं के अन्तर्गत है।

 सिर्फ भृगु, अंगिरा के वंशवाले ही उनके सिवाय और हैं जिन ऋषियों के नाम से भी गोत्र व्यवहार होता है।

इस प्रकार कुल दस ऋषि मूल में है। इस प्रकार देखा जाता है कि इन दसों के वंशज ऋषि लाखों हो गए होंगे और उतने ही गोत्र भी होने चाहिए।

गोत्र शब्द  एक अर्थ  में  गो अर्थात्  पृथ्वी का पर्याय भी है ओर 'त्र' का अर्थ रक्षा करने वाला भी हे। यहाँ गोत्र का अर्थ पृथ्वी की रक्षा करें वाले ऋषि से ही है।

गो शब्द इन्द्रियों का वाचक भी है, ऋषि- मुनि अपनी इन्द्रियों को वश में कर अन्य प्रजाजनों का मार्ग दर्शन करते थे, इसलिए वे गोत्रकारक कहलाए।

ऋषियों के गुरुकुल में जो शिष्य शिक्षा प्राप्त कर जहा कहीं भी जाते थे , वे अपने गुरु या आश्रम प्रमुख ऋषि का नाम बतलाते थे, जो बाद में उनके वंशधरो में स्वयं को उनके वही गोत्र कहने की परम्परा आविर्भूत हुई । जाति की तरह गोत्रों का भी अपना महत्‍व है ।।

2 -प्रवर .....

प्रवर का अर्थ हे 'श्रेष्ठ" । अपनी कुल परम्परा के पूर्वजों एवं महान ऋषियों को प्रवर कहते हें ।

 अपने कर्मो द्वारा ऋषिकुल में प्राप्‍त की गई श्रेष्‍ठता के अनुसार उन गोत्र प्रवर्तक मूल ऋषि के बाद होने वाले व्यक्ति, जो महान हो गए वे उस गोत्र के प्रवर कहलाते हें।

इसका अर्थ है कि आपके कुल में आपके गोत्रप्रवर्त्तक मूल ऋषि के अनन्तर तीन अथवा पाँच आदि अन्य ऋषि भी विशेष महान हुए थे l

प्रवर का अर्थ हुआ कि उन मन्त्रद्रष्टा ऋषियों में जो श्रेष्ठ हो।

 प्रवर का एक और भी अर्थ है। ..

यज्ञ के समय अधवर्यु या होता के द्वारा ऋषियों का नाम ले कर अग्नि की प्रार्थना की जाती है। उस प्रार्थना का अभिप्राय यह है कि जैसे अमुक-अमुक ऋषि लोग बड़े ही प्रतापी और योग्य थे। अतएव उनके हवन को देवताओं ने स्वीकार किया। उसी प्रकार, हे अग्निदेव, यह यजमान भी उन्हीं का वंशज होने के नाते हवन करने योग्य है।

 इस प्रकार जिन ऋषियों का नाम लिया जाता है वही प्रवर कहलाते हैं। यह प्रवर किसी गोत्र के एक, किसी के दो, किसी के तीन और किसी के पाँच तक होते हैं न तो चार प्रवर किसी गोत्र के होते हैं और न पाँच से अधिक।

 यही परम्परा चली आती हैं। ऐसा ही आपस्तंब आदि का वचन लिखा है। हाँ, यह अवश्य है कि किसी ऋषि के मत से सभी गोत्रों के तीन प्रवर होते हैं। जैसा कि :

त्रीन्वृणीते मंत्राकृतोवृणीते॥ 7॥

अथैकेषामेकं वृणीते द्वौवृणीते त्रीन्वृणीते न चतुरोवृणीते न पंचातिवृणीते॥ 8॥

3 -वेद .....

वेदों का साक्षात्कार ऋषियों ने सभी के लाभ के लिए किया है , इनको सुनकर याद किया जाता है , इन वेदों के उपदेशक गोत्रकार ऋषियों के जिस भाग का अध्ययन, अध्यापन, प्रचार प्रसार, आदि किया, उसकी रक्षा का भार उसकी संतान पर पड़ता गया इससे उनके पूर्व पुरूष जिस वेद ज्ञाता थे तदनुसार वेदाभ्‍यासी कहलाते हैं।

प्रत्येक ब्राह्मण का अपना एक विशिष्ट वेद होता है , जिसे वह अध्ययन -अध्यापन करता है ।

आसान शब्दो मे गौत्र प्रवर्तक ऋषि जिस वेद को चिन्‍तन, व्‍याख्‍यादि के अध्‍ययन एवं वंशानुगत निरन्‍तरता पढ़ने की आज्ञा अपने वंशजों को देता है, उस ब्राम्हण वंश (गोत्र) का वही वेद माना जाता है।

वेद का अभिप्राय यह है कि उस गोत्र का ऋषि ने उसी वेद के पठन-पाठन या प्रचार में विशेष ध्यान दिया और उस गोत्रवाले प्रधानतया उसी वेद का अध्ययन और उसमें कहे गए कर्मों का अनुष्ठान करते आए।

इसीलिए किसी का गोत्र यजुर्वेद है तो किसी का सामवेद और किसी का ऋग्वेद है, तो किसी का अथर्ववेद। उत्तर के देशों में प्राय: साम और यजुर्वेद का ही प्रचार था। किसी-किसी का ही अथर्ववेद मिलता है।

4..उपवेद ....

प्रत्येक वेद  से  सम्बद्ध ब्राम्हण को  विशिष्ट  उपवेद  का  भी  ज्ञान  होना  चाहिये  । वेदों की सहायता के लिए कलाकौशल का प्रचार कर संसार की सामाजिक उन्‍नति का मार्ग बतलाने वाले शास्‍त्र का नाम उपवेद है।

उपवेद उन सब विद्याओं को कहा जाता है, जो वेद के ही अन्तर्गत हों। यह वेद के ही आश्रित तथा वेदों से ही निकले होते हैं। जैसे-

धनुर्वेद ... विश्वामित्र ने इसे यजुर्वेद से निकला था।

गन्धर्ववेद ... भरतमुनि ने इसे सामवेद से निकाला था।

आयुर्वेद .... धन्वंतरि ने इसे ऋग्वेद से निकाला था।

स्थापत्य ....विश्वकर्मा ने अथर्ववेद से इसे निकला था।

हर गोत्र का अलग अलग उपवेद होता है

5...शाखा .....

वेदो के विस्तार के साथ ऋषियों ने प्रत्येक एक गोत्र के लिए एक वेद के अध्ययन की परंपरा डाली है , कालान्तर में जब एक व्यक्ति उसके गोत्र के लिए निर्धारित वेद पढने में असमर्थ हो जाता था तो ऋषियों ने वैदिक परम्परा को जीवित रखने के लिए शाखाओं का निर्माण किया।

इस प्रकार से प्रत्येक गोत्र के लिए अपने वेद की उस शाखा का पूर्ण अध्ययन करना आवश्यक कर दिया। इस प्रकार से उन्‍होने जिसका अध्‍ययन किया, वह उस वेद की शाखा के नाम से पहचाना गया।

प्रत्‍येक वेद में कई शाखायें होती हैं। जैसे --

ऋग्‍वेद की 21 शाखा...

 प्रयोग में 5 शाकल, वाष्कल,आश्वलायन, शांखायन और माण्डूकायन...

यजुर्वेद की 101 शाखा....

 प्रयोग में 5काठक,
कपिष्ठल,मैत्रियाणी,तैतीरीय,वाजसनेय...

सामवेद की 1000 शाखा...

सभी गायन , मन्त्र यांत्रिक प्रचलित विधान...

अथर्ववेद की 9 शाखा ....

पैपल, दान्त, प्रदान्त,  स्नात, सौल, ब्रह्मदाबल, शौनक, देवदर्शत और चरणविद्या...
है।

इस प्रकार चारों वेदों की 1131 शाखा होती है।

 प्रत्‍येक वेद की अथवा अपने ही वेद की समस्‍त शाखाओं को अल्‍पायु मानव नहीं पढ़ सकता, इसलिए महर्षियों ने 1 शाखा अवश्‍य पढ़ने का पूर्व में नियम बनाया था और अपने गौत्र में उत्‍पन्‍न होने वालों को आज्ञा दी कि वे अपने वेद की अमूक शाखा को अवश्‍य पढ़ा करें, इसलिए जिस गौत्र वालों को जिस शाखा के पढ़ने का आदेश दिया, उस गौत्र की वही शाखा हो गई।

जैसे पराशर गौत्र का शुक्‍ल यजुर्वेद है और यजुर्वेद की 101 शाखा है। वेद की इन सब शाखाओं को कोई भी व्‍यक्ति नहीं पढ़ सकता, इसलिए उसकी एक शाखा (माध्‍यन्दिनी) को प्रत्‍येक व्‍यक्ति 1-2 साल में पढ़ कर अपने ब्राम्हण होने का कर्तव्य पूर्ण कर सकता है ।।

6...सूत्र ....

व्यक्ति शाखा के अध्ययन में असमर्थ न हो , अतः उस गोत्र के परवर्ती ऋषियों ने उन शाखाओं को सूत्र रूप में विभाजित किया है, जिसके माध्यम से उस शाखा में प्रवाहमान ज्ञान व संस्कृति को कोई क्षति न हो और कुल के लोग संस्कारी हों !

वेदानुकूल स्‍मृतियों में ब्राह्मणों के कर्मो का वर्णन किया है, उन कर्मो की विधि बतलाने वाले ग्रन्‍थ ऋषियों ने सूत्र रूप में लिखे हैं और वे ग्रन्‍थ भिन्‍न-भिन्‍न गौत्रों के लिए निर्धारित वेदों के भिन्‍न-भिन्‍न सूत्र ग्रन्‍थ हैं। 

ऋषियों की शिक्षाओं को सूत्र कहा जाता है। प्रत्येक वेद का अपना सूत्र है। सामाजिक, नैतिक तथा शास्त्रानुकूल नियमों वाले सूत्रों को धर्म सूत्र कहते हैं,.ll
 आनुष्ठानिक वालों को श्रौत सूत्र तथा घरेलू विधिशास्त्रों की व्याख्या करने वालों को गॄह् सूत्र कहा जाता है।

सूत्र सामान्यतः पद्य या मिश्रित गद्य-पद्य में लिखे हुए हैं।

7...छन्द ....

प्रत्येक ब्राह्मण का अपना परम्परासम्मत छन्द होता है जिसका ज्ञान हर ब्राम्हण को होना चाहिए   ।
छंद वेदों के मंत्रों में प्रयुक्त कवित्त मापों को कहा जाता है। श्लोकों में मात्राओं की संख्या और उनके लघु-गुरु उच्चारणों के क्रमों के समूहों को छंद कहते हैं - वेदों में कम से कम 15 प्रकार के छंद प्रयुक्त हुए हैं, और हर गोत्र का एक परम्परागत छंद है ।

अत्यष्टि (ऋग्वेद 9.111.9)
अतिजगती(ऋग्वेद 5.87.1)
अतिशक्वरी
अनुष्टुप
अष्टि
उष्णिक्
एकपदा विराट (दशाक्षरा भी कहते हैं)
गायत्री(प्रसिद्ध गायत्री मंत्र)
जगती
त्रिषटुप
द्विपदा विराट
धृति
पंक्ति
प्रगाथ
प्रस्तार पंक्ति
बृहती
महाबृहती
विराट
शक्वरी

विशेष -- ...

वेद प्राचीन ज्ञान विज्ञान से युक्त ग्रन्थ है जिन्हें अपौरुषेय (किसी मानव/देवता ने नहीं लिखे) तथा अनादि माना जाता हैं, बल्कि अनादि सत्य का प्राकट्य है जिनकी वैधता शाश्वत है।

वेदों को श्रुति माना जाता है (श्रवण हेतु, जो मौखिक परंपरा का द्योतक है) लिखे हुए में मिलावट की जा सकती है लेकिन जो कंठस्थ है उसमें कोई कैसे मिलावट कर सकता है इसलिए ब्राम्हणो ने वेदों को श्रुति के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाया.ll

 जो ज्ञान शदियों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता रहा , हर ब्राम्हण अपने बच्चों को ये जिम्मेदारी देता था कि वो अपने पूर्वजों की इस धरोहर का इस ज्ञान का वाहक बने और समाज और आने वाली पीढ़ी को ये ज्ञान दे ....

लेकिन हम इस पश्चिमीकरण के दौड़ में इस कदर अंधे हुए की हम अपनी जिम्मेदारियों को विस्मृत कर बैठे.ll

वेदों में वो सब कुछ है जो आज भी विज्ञान के लिए आश्चर्य का विषय है जरूरत है तो बस उन कंधों की जो इस जिम्मेदारी का भार उठा सके ।।

8..शिखा ....

अपनी कुल परम्परा के अनुरूप शिखा को दक्षिणावर्त अथवा वामावार्त्त रूप से बांधने  की परम्परा शिखा कहलाती है ।शिखा में जो ग्रंथि देता वह बाईं तरफ घुमा कर और कोई दाहिनी तरफ। प्राय: यही नियम था कि सामवेदियों की बाईं शिखा और यजुर्वेदियों की दाहिनी शिखा कही कही इसमे भी भेद मिलता है ।।
परम्परागत रूप से हर ब्राम्हण को शिखा धारण करनी चाहिए ( इसका अपना वैज्ञानिक लाभ है) लेकिन आज कल इसे धारण करने वाले को सिर्फ कर्मकांडी ही माना जाता है ना तो किसी को इसका लाभ पता है ना कोई रखना चाहता है ।।

9...पाद ..

अपने-अपने गोत्रानुसार लोग अपना पाद प्रक्षालन करते हैं । ये भी अपनी एक पहचान बनाने के लिए ही, बनाया गया एक नियम है । अपने -अपने गोत्र के अनुसार ब्राह्मण लोग पहले अपना बायाँ पैर धोते, तो किसी गोत्र के लोग पहले अपना दायाँ पैर धोते, इसे ही पाद कहते हैं ।सामवेदियों का बायाँ पाद और  इसी प्रकार यजुर्वेदियों की दाहिना पाद माना जाता है ।।

10...देवता ....

प्रत्येक वेद या शाखा का पठन, पाठन करने वाले किसी विशेष देव की आराधना करते है वही उनका कुल देवता (गणेश , विष्णु, शिव , दुर्गा ,सूर्य इत्यादि पञ्च देवों में से कोई एक) उनके आराध्‍य देव है । इसी प्रकार कुल के भी  संरक्षक  देवता या कुलदेवी होती हें । इनका ज्ञान कुल के वयोवृद्ध  अग्रजों (माता-पिता आदि ) के द्वारा अगली पीड़ी को दिया जाता  है । एक कुलीन ब्राह्मण को अपने तीनों प्रकार के देवताओं का बोध  तो अवश्य ही  होना चाहिए -

(1) इष्ट देवता अथवा इष्ट देवी ।
(2) कुल देवता अथवा कुल देवी ।
(2) ग्राम देवता अथवा ग्राम देवी ।

11...द्वार ....

यज्ञ मण्डप में अध्वर्यु (यज्ञकर्त्ता )  जिस दिशा अथवा द्वार से प्रवेश करता है अथवा जिस दिशा में बैठता है, वही उस गोत्र वालों की द्वार होता है।
यज्ञ मंडप तैयार करने की कुल 39 विधाएं है और हर गोत्र के ब्राम्हण के प्रवेश के लिए अलग द्वार होता है।