Tuesday, 22 August 2017

लक्ष्मी मां के लिए यह उपाय कर


१. शुक्रवार के दिन दक्षिणावर्ती शंख में जल भरकर भगवान विष्णु का अभिषेक करें। इस उपाय में मां लक्ष्मी जल्दी प्रसन्न हो जाती हैं।
२.अक्षय नवमी के दिन सुबह स्नान समय अपने आवंला के रस की कुछ बूंदे अपनी स्नान के पानी में डालें। इससे नहानें से माता प्रसन्न होगी। साथ ही नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है। क्योंकि अक्षय नवमी के आंवला के वृक्ष की पूजा की जाती है।
३.इस दिन शाम के समय घर के ईशान कोण में गाय के घी का दीपक लगाएं। बत्ती में रुई के स्थान पर लाल रंग के धागे का उपयोग करें साथ ही दीए में थोड़ी सी केसर भी डाल दें।
४.शुक्रवार को तीन कुंवारी कन्याओं को घर बुलाकर खीर खिलाएं तथा पीला वस्त्र व दक्षिणा देकर विदा करें। इससे भी मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं।
५.इस दिन दान देने का भी विशेष महत्व है इसलिए इस दिन जितना हो

पितृ-दोष कि शांति के उपाय.......


सामान्य उपायों में षोडश पिंड दान ,सर्प पूजा ,ब्राह्मण को गौ -दान
,कन्या -दान,कुआं ,बावड़ी ,तालाब आदि बनवाना ,मंदिर
प्रांगण में पीपल ,बड़(बरगद) आदि देव वृक्ष लगवाना
एवं विष्णु मन्त्रों का जाप आदि करना ,प्रेत श्राप को दूर करने के
लिए श्रीमद्द्भागवत का पाठ करना चाहिए |
वेदों और पुराणों में पितरों की संतुष्टि के लिए मंत्र ,स्तोत्र
एवं सूक्तों का वर्णन है ,जिसके नित्य पठन से किसी
भी प्रकार की पितृ बाधा क्यों ना हो ,शांत हो
जाती है | अगर नित्य पठन संभव ना हो , तो कम से
कम प्रत्येक माह की अमावस्या और आश्विन कृष्ण
पक्ष अमावस्या अर्थात
पितृपक्ष में अवश्य करना चाहिए |
वैसे तो कुंडली में किस प्रकार का पितृ दोष है उस पितृ
दोष के प्रकार के हिसाब से पितृदोष शांति करवाना अच्छा होता
है,लेकिन कुछ ऐसे सरल सामान्य उपाय भी हैं,जिनको
करने से पितृदोष शांत हो जाता है,ये उपाय निम्नलिखित हैं:-
सामान्य उपाय :
१ .ब्रह्म पुराण (२२०/१४३ )में पितृ गायत्री मंत्र दिया
गया है ,इस मंत्र कि प्रतिदिन १ माला या अधिक जाप करने से पितृ
दोष में अवश्य लाभ होता है|
मंत्र :
देवताभ्यः पित्रभ्यश्च महा योगिभ्य एव च |
नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः || "
२. मार्कंडेय पुराण (९४/३ -१३ )में वर्णित इस
चमत्कारी पितृ स्तोत्र का नियमित पाठ करने से
भी पितृ प्रसन्न होकर स्तुतिकर्ता मनोकामना कि
पूर्ती करते हैं :-
पुराणोक्त पितृ -स्तोत्र :
अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि।।
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलिः।।
देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येऽहं कृतांजलिः।।
प्रजापतं कश्यपाय सोमाय वरूणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः।।
नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।
सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।
अग्निरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम्।
अग्निषोममयं विश्वं यत एतदशेषतः।।
ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः।।
तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुजः।।
अर्थ:
===
रूचि बोले - जो सबके द्वारा पूजित, अमूर्त, अत्यन्त
तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्यदृष्टि सम्पन्न
हैं, उन पितरों को मैं सदा नमस्कार करता हूँ।
जो इन्द्र आदि देवताओं, दक्ष, मारीच, सप्तर्षियों तथा
दूसरों के भी नेता हैं, कामना की पूर्ति करने
वाले उन पितरो को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो मनु आदि राजर्षियों, मुनिश्वरों तथा सूर्य और चन्द्रमा के
भी नायक हैं, उन समस्त पितरों को मैं जल और समुद्र
में भी नमस्कार करता हूँ।
नक्षत्रों, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश और द्युलोक तथा
पृथ्वी के भी जो नेता हैं, उन पितरों को मैं
हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।
जो देवर्षियों के जन्मदाता, समस्त लोकों द्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय
फल के दाता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।
प्रजापति, कश्यप, सोम, वरूण तथा योगेश्वरों के रूप में स्थित पितरों को
सदा हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।
सातों लोकों में स्थित सात पितृगणों को नमस्कार है। मैं योगदृष्टिसम्पन्
न स्वयम्भू ब्रह्माजी को प्रणाम करता हूँ।
चन्द्रमा के आधार पर प्रतिष्ठित तथा योगमूर्तिधारी
पितृगणों को मैं प्रणाम करता हूँ। साथ ही सम्पूर्ण
जगत् के पिता सोम को नमस्कार करता हूँ।
अग्निस्वरूप अन्य पितरों को मैं प्रणाम करता हूँ, क्योंकि यह
सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोममय है।
जो पितर तेज में स्थित हैं, जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप
में दृष्टिगोचर होते हैं तथा जो जगत्स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं,
उन सम्पूर्ण योगी पितरो को मैं एकाग्रचित्त होकर
प्रणाम करता हूँ। उन्हें बारम्बार नमस्कार है। वे
स्वधाभोजी पितर मुझपर प्रसन्न हों।
विशेष - मार्कण्डेयपुराण में महात्मा रूचि द्वारा की
गयी पितरों की यह स्तुति ‘पितृस्तोत्र’
कहलाता है। पितरों की प्रसन्नता की
प्राप्ति के लिये इस स्तोत्र का पाठ किया जाता है। इस स्तोत्र
की बड़ी महिमा है। श्राद्ध आदि के
अवसरों पर ब्राह्मणों के भोजन के समय भी इसका पाठ
करने-कराने का विधान है।
३.भगवान भोलेनाथ की तस्वीर या प्रतिमा के
समक्ष बैठ कर या घर में ही भगवान भोलेनाथ का ध्यान
कर निम्न मंत्र की एक माला नित्य जाप करने से
समस्त प्रकार के पितृ- दोष संकट बाधा आदि शांत होकर शुभत्व
की प्राप्ति होती है |मंत्र जाप प्रातः या
सायंकाल कभी भी कर सकते हैं :
मंत्र :
"ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात ||
४.अमावस्या को पितरों के निमित्त पवित्रता पूर्वक बनाया गया भोजन
तथा चावल बूरा ,घी एवं एक रोटी गाय को
खिलाने से पितृ दोष शांत होता है |
५ . अपने माता -पिता ,बुजुर्गों का सम्मान,सभी
स्त्री कुल का आदर /सम्मान करने और
उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते
रहने से पितर हमेशा प्रसन्न रहते हैं |
६ . पितृ दोष जनित संतान कष्ट को दूर करने के लिए "हरिवंश पुराण
" का श्रवण करें या स्वयं नियमित रूप से पाठ करें |
७ . प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती या सुन्दर काण्ड का पाठ
करने से भी इस दोष में कमी
आती है |
८.सूर्य पिता है अतः ताम्बे के लोटे में जल भर कर ,उसमें लाल फूल
,लाल चन्दन का चूरा ,रोली आदि डाल कर सूर्य देव को
अर्घ्य देकर ११ बार "ॐ घृणि सूर्याय नमः " मंत्र का जाप
करने से पितरों की प्रसन्नता एवं उनकी
ऊर्ध्व गति होती है |
९. अमावस्या वाले दिन अवश्य अपने पूर्वजों के नाम दुग्ध
,चीनी ,सफ़ेद कपडा ,दक्षिणा आदि
किसी मंदिर में अथवा किसी योग्य ब्राह्मण
को दान करना चाहिए |
१० .पितृ पक्ष में पीपल की परिक्रमा
अवश्य करें | अगर १०८ परिक्रमा लगाई जाएँ ,तो पितृ दोष अवश्य
दूर होगा |

विभिन्न ऋण और पितृ दोष.....


हमारे ऊपर मुख्य रूप से ५ ऋण होते हैं जिनका कर्म न करने
(ऋण न चुकाने पर ) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है ,ये ऋण
हैं : मातृ ऋण ,पितृ ऋण ,मनुष्य ऋण ,देव ऋण और ऋषि ऋण |
मातृ ऋण :
माता एवं माता पक्ष के सभी लोग
जिनमेंमा,मामी ,नाना ,नानी ,मौसा
,मौसी और इनके तीन
पीढ़ी के पूर्वज होते हैं ,क्योंकि माँ का
स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है अतः यदि माता के
प्रति कोई गलत शब्द बोलता है ,अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट
देता रहता है,तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट
भोगने पड़ते हैं |इतना ही नहीं ,इसके
बाद भी कलह और कष्टों का दौर भी
परिवार में पीढ़ी दर
पीढ़ी चलता ही रहता है |
पितृ ऋण :
पिता पक्ष के लोगों जैसे बाबा ,ताऊ ,चाचा, दादा-दादी और
इसके पूर्व की तीन
पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को
प्रभावित करता है |पिता हमें आकाश की तरह
छत्रछाया देता है,हमारा जिंदगी भर पालन -पोषण करता
है ,और अंतिम समय तक हमारे सारे दुखों को खुद झेलता रहता
है |पर आज के के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या
नयी पीढ़ी कर
रही है ?पितृ -भक्ति करना मनुष्य का धर्म है ,इस
धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी
पीढ़ी को झेलना ही पड़ता है
,इसमें घर में आर्थिक अभाव,दरिद्रता ,संतानहीनता
,संतान को विबिन्न प्रकार के कष्ट आना या संतान अपंग रह जाने से
जीवन भर कष्ट की प्राप्ति आदि |
देव ऋण :माता -पिता प्रथम देवता हैं,जिसके कारण भगवान गणेश
महान बने |इसके बाद हमारे इष्ट भगवान शंकर जी
,दुर्गा माँ ,भगवान विष्णु आदि आते हैं ,जिनको हमारा कुल मानता आ
रहा है ,हमारे पूर्वज भी भी अपने
अपने कुल देवताओं को मानते थे , लेकिन नयी
पीढ़ी ने बिलकुल छोड़ दिया है |
इसी कारण भगवान /कुलदेवी /कुलदेवता
उन्हें नाना प्रकार के कष्ट /श्राप देकर उन्हें अपनी
उपस्थिति का आभास कराते हैं|
ऋषि ऋण :
जिस ऋषि के गोत्र में पैदा हुए ,वंश वृद्धि की ,उन
ऋषियों का नाम अपने नाम के साथ जोड़ने में नयी
पीढ़ी कतराती है ,उनके ऋषि
तर्पण आदि नहीं करती है | इस कारण
उनके घरों में कोई मांगलिक कार्य नहीं होते हैं,इसलिए
उनका श्राप पीडी दर
पीढ़ी प्राप्त होता रहता है |
मनुष्य ऋण :
माता -पिता के अतिरिक्त जिन अन्य मनुष्यों ने हमें प्यार दिया ,दुलार
दिया ,हमारा ख्याल रखा ,समय समय पर मदद की |गाय
आदि पशुओं का दूध पिया |जिन अनेक मनुष्यों ,पशुओं ,पक्षियों ने
हमारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मदद
की ,उनका ऋण भी हमारे ऊपर हो गया |
लेकिन लोग आजकल गरीब ,बेबस ,लाचार लोगों
की धन संपत्ति हरण करके अपने को ज्यादा गौरवान्वित
महसूस करते हैं|इसी कारण देखने में आया है कि
ऐसे लोगों का पूरा परिवार जीवन भर नहीं
बस पाता है,वंश हीनता ,संतानों का गलत संगति में पड़
जाना,परिवार के सदस्यों का आपस में सामंजस्य न बन पाना ,परिवार कि
सदस्यों का किसी असाध्य रोग से ग्रस्त रहना इत्यादि
दोष उस परिवार में उत्पन्न हो जाते हैं |ऐसे परिवार को पितृ दोष
युक्त या शापित परिवार कहा जाता है| रामायण में श्रवण कुमार के
माता -पिता के श्राप के कारण दशरथ के परिवार को हमेशा कष्ट
झेलना पड़ा,ये जग -ज़ाहिर है |इसलिए परिवार कि
सर्वोन्नती के पितृ दोषों का निवारण करना बहुत
आवश्यक है|

जन्म पत्रिका और पितृ दोष.....


जन्म पत्रिका में लग्न ,पंचम ,अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष
का विचार किया जाता है |पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य
,चन्द्रमा ,गुरु ,शनि ,और राहू -केतु की स्थितियों से पितृ
दोष का विचार किया जाता है |इनमें से भी गुरु ,
शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में
महत्वपूर्ण होती है |
इनमें सूर्य से पिता या पितामह , चन्द्रमा से माता या मातामह ,मंगल
से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का
विचार किया जाता है |अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में
मुख्य रूप से क्योंकि गुरु ,शनि और राहु से पीड़ित होने
पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है ,इसलिए विभिन्न
उपायों को करने के साथ साथ व्यक्ति यदि पंचमुखी
,सातमुखी और आठ मुखी रुद्राक्ष
भी धारण कर ले , तो पितृ दोष का निवारण
शीघ्र हो जाता है |पितृ दोष निवारण के लिए इन
रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे
मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता
है |

पितृ -दोष


पितर या पितृ गण कौन हैं ?
पितृ गण हमारे पूर्वज हैंजिनका ऋण हमारे ऊपर है ,क्योंकि
उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया
है | मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है,पितृ लोक के ऊपर सूर्य
लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है| आत्मा
जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर
उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है
,वहाँ हमारे पूर्वज मिलते हैं |अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य
हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को
धन्य मानते हैं की इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में
जन्म लेकर हमें धन्य किया |इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के
आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढती है |
वहाँ से आगे ,यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को
बेध कर स्वर्ग लोक की तरफ चली
जाती है,लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा
ही ऐसी होती है ,जो
परमात्मा में समाहित होती है |जिसे दोबारा जन्म
नहीं लेना पड़ता | मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत
सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश ,मोह
वश अपने कुल में जन्म लेती हैं|
पितृ दोष क्या होता है?
हमारे ये ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर
से अपने परिवार को जब देखते हैं ,और महसूस करते हैं कि
हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न
ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना
ही किसी भी अवसर पर ये
हमको याद करते हैं,ना ही अपने ऋण चुकाने का
प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी
होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं,जिसे "पितृ-
दोष" कहा जाता है |
पितृ दोष एक अदृश्य बाधा है .ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के
कारण होती है |पितरों के रुष्ट होने के बहुत से
कारण हो सकते हैं ,आपके आचरण से,किसी परिजन
द्वारा की गयी गलती से
,श्राद्ध आदि कर्म ना करने से ,अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई
किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है |
इसके अलावा मानसिक अवसाद,व्यापार में नुक्सान ,परिश्रम के अनुसार
फल न मिलना ,वैवाहिक जीवन में समस्याएं कैरिअर में
समस्याएं या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर
क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता
है , पितृ दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति ,गोचर
,दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल
पाते, कितना भी पूजा पाठ ,देवी ,देवताओं
की अर्चना की जाए ,उसका शुभ फल
नहीं मिल पाता|
पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है :-
१.अधोगति वाले पितरों के कारण
२. .उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण
1:- अधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया
गया गलत आचरण,परिजनों की अतृप्त इच्छाएं ,जायदाद
के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग
होने पर,विवाहादिमें परिजनों द्वारा गलत निर्णय .परिवार के
किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध
हो जाते हैं ,परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और
अपनी शक्ति से
नकारात्मक फल प्रदान करते हैं|
2:- उर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न
नहीं करते ,परन्तु उनका किसी
भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक
रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं
करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं |इनके द्वारा उत्पन्न
पितृदोष से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति
बिलकुल बाधित हो जाती है ,फिर चाहे कितने
भी प्रयास क्यों ना किये जाएँ ,कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये
जाएँ,उनका कोई भी कार्य ये पितृदोष सफल
नहीं होने देता |
पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी
होता है कि किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष
उत्पन्न हो रहा है ?

" नहाने के पानी में मिलाएंगे ये चीजें हो जाएंगे मालामाल



हर किसी व्यक्ति को रोज प्रात:काल सुबह जल्दी उठना चाहिए। क्योंकि सुबह जल्दी उठाना भी आपके सोएं भाग्य को जगा सकता है। स्नान करते वक्त यदि कुछ बातों को जहन में रखा जाए तो निरोगी और खूबसूरत काया के साथ-साथ बहुत से शुभ फलों की प्राप्ति भी की जा सकती है जैसे लक्ष्मी कृपा, कुशाग्र बुध्दि और चमकती दमकती त्वचा। सुबह सबेरे सूर्य उदय से पूर्व तारों की छाया में नहाने से अलक्ष्मी, परेशानियों और बुरी शक्तियों से मुक्ति पाई जा सकती है।

आपको रोज सुबह जल्दी नहाना चाहिए और नहाने के पानी में काले तिल मिलाएं। इस उपाय से आपका दुभार्गय दुर हो सकता है।

-हर शनिवार काले तिल,काली उड़द को काले कपड़े में बांधकर किसी गरीब व्यक्ति को दान करे इससे पैसो से जुड़ी समस्याएं दुर हो सकती है।

दुध में काले तिल मिलाकर पीपल पर चढ़ाने से बुरा समय दुर हो जाता है।

 -हर रोज एक लो़टे में शुद्ध जल भरें और उसमें थोड़े काले तिल डाल दें। अब इस जल को शिवलिंग पर ऊँ नम: शिवाय मंत्र जप करते हुए चढ़ाए।

-यदि शनि की साढ़ेसाती या ढय्या का समय चल रहा हो तो किसी पवित्र नदी में हर शनिवार काले तिल प्रावाहित करे। इस उपाय को करने से शनि के दोषों की शांति होती है।

-काले तिल का दान करने से राहु केतु और शनि संबंधी कई अशुभ योगों के बुरे प्रभाव समाप्त पो जाते है। कालसर्प योग,साढेसाती पित् दोष आदि में यह उपाय करना चाहिए।

अगर आप भी करेंगे ये उपाय बदल सकती है आप की भी लाइफ ऐसे जैसे बताया गया है वैसे ही करे

दिन के अनुसार घर लाएं ये ,खास वस्तु फिर निश्चित फायदा होगा


माना जाता है कि जिस तरह हर दिन का संबंध किसी न किसी खास भगवान से होता है ठीक उसी तरह हर भगवान का संबंध भी किसी खास रंग से होता है। अगर हर दिन के अनुसार संबंधित खास रंग की या कोई खास वस्तु घर लाकर रख दी जाए तो आपके बिगड़े काम बन सकते हैं। अगर कई कोशिशों के बाद भी किसी कार्य में सफलता नहीं मिल रही है तो आप इसे जरूर पढ़ें।

1. शनि देवता को स‍मर्पित इस दिन के लिए नीला या काला रंग खास होता है। यह रंग मन के उतार चढ़ाव का होता है। शनिवार को नीले या काले रंग की कोई तस्‍वीर या शो पीस सीढि़यों के आस पास रखें।

2. सोमवार शिवजी का दिन है इसलिए इस दिन सफेद रंग शुभ माना जाता है। अगर लगातार किसी काम में असफलता मिल रही है तो सोमवार को सफेद रंग की कोई मूर्ति घर के हॉल में लाकर रख दें।

3. मंगलवार हनुमान जी का दिन होता है। इस दिन का विशेष रंग ऑरेंज या लाल होता है। अगर इस दिन के लिए घर के मंदिर में लाल या ऑरेंज रंग का कोई शो पीस घर की दक्षिण दिशा में लाकर रखना बेहद शुभ होता है।


4. बुधवार गणेश भगवान का दिन है, जिन्‍हें दूर्वा सबसे ज्‍यादा प्रिय है। इसलिए इस दिन हरे रंग की कोई तस्‍वीर लाकर घर के मेनगेट के पास या सामने स्‍थापित करें।

5. गुरूवार बृहस्‍पति देव का दिन है। इस दिन पीले रंग का महत्‍व होता है। इस दिन पीले रंग की कोई भी वस्‍तु घर के कीचन में कहीं भी रख दें। ऐसा करने से तरक्‍की होगी।

6. शुक्रवार देवी का दिन होता है इसलिए इस दिन रंगों का मिक्‍स या प्रिंटेड कपड़ो का होता है। इस दिन विशेष रूप से गुलाबी और रंग बिरंगे प्रिंट वाले कपड़े या चंनरी घर के मंदिर में रखें।

7. रविवार सूर्यदेव का दिन होता है इस दिन गुलाबी सुनहरे और संतरी रंग का विशेष म‍हत्‍व है। रविवार को इन रंगो में से किस 1 रंग की कोई भी वस्‍तु लाकर बच्‍चों के कमरे में रख दें।

जन्मपत्री ज्योतिषशास्त्र

"यस्य नास्ति खलु जन्मपत्रिका या शुभाशुभफलप्रदायिनी।
अन्धकं भवति तस्य जीवितं दीपहिनमिव मन्दिरमं निशि।।

संस्कृत के इस सुंदर श्लोक में कहा गया है कि
" शुभ और अशुभ फल को बतलाने वाली जन्मपत्री जिस मनुष्य की नही बनी है,उसका जीवन अन्धे के जैसा है या की ऐसे घर, मंदिर समान जिसमे रात में दिया ना जला हो।"

   जिन्हें ज्योतिषशास्त्र में विश्वास ना हो या जिनका वास्ता ही स्वयम्भू ज्योतिष सम्राटों से,ठगों से पड़ा हो , वो हज़ारों तर्क दे सकते है कि ये सब अवैज्ञानिक है,झूठजाल है मगर उनकी भी कमी नही है जिन्हें इस शास्त्र के ज्ञाताओं ने बार बार संकट से उबारा है।

    नई पीढ़ी से यही विनती है बगैर धर्म,जाति, सम्प्रदाय की गणित में उलझे जन्मपत्री बनवा ज़रूर ले,हमारी सांस्कृतिक धरोहर है ये ज्ञान भी।

ज्योतिष में धन योग




वैदिक ज्योतिष के अनुसार हमारे जीवन की हर छोटी व बड़ी घटना कुंडली के 12 भाव,12 राशियों और 9 ग्रहों से जुडी होती है , जब आप अपने जीवन में किसी चीज़ को प्राप्त करने की कोशिश करते है तो वह चीज़ आप तक पहुचेगी या नहीं इस बात का फैसला आपकी कुंडली में स्थित ग्रह करते है, आपके अच्छे गृह आपको जीवन में सफलताओं की और प्रेरित करते है और बुरे गृह जीवन में हर कदम पर परेशानिया उत्पन्न करते है, आप अपने जीवन में कितना धन कमाएंगे इसका फैसला भी आपकी कुंडली में स्थित वह गृह करते जो धन योग से सम्बन्ध रखते है ! यदि धन योग का निर्माण करने वाले गृह खराब घरों में अथवा खराब अवस्था में होते है तो वह अपने कार्य को पूरा नहीं कर सकते , फलस्वरूप जातक धन होने की बजाये गरीबी की जिन्दगी प्राप्त करता है, ग्रहों स्थिति यदि ज्यदा खराब हो तो जातक के ऊपर जीवन भर क़र्ज़ रहता है, और वह जीवन भर क़र्ज़ में डूबा रहता है ! और यही कारण है की हर जातक जो महनत करता धनवान नहीं होता क्योकि धन वां होने के लिए कुंडली अच्छे धन योगो का होना अनिवार्य है और उन ग्रहों से सम्बंधित दशा और अंतर दशाओं का होना भी आवशयक है ।
पहले घर का मालिक गृह हमेशा अच्छी स्थिति में , केंद्र अथवा त्रिकोण में होना चाहिए ताकि जातक के जीवन में कम से कम परेशनिया और अच्छी सेहत मिल सके !
वैदिक ज्योतिष के अनुसार कुंडली का पहला, दूसरा, दसवां और ग्यारहवां धन योग से सम्बन्ध रखता है ! और इन घरों के मालिक ग्रहों और उनकी दशाओं का संबध होना भी अनिवार्य होता है !
दूसरा घर हमारा धन स्थान होता है यहाँ से जातक के संचय धन का पता चलता है , दुसरे स्थान के मालिक की अच्छी  स्थिति किसी अच्छे गृह के साथ केंद्र या त्रिकोण में एक बेहतरीन धनयोग का निर्माण करती है , , दसवा घर हमारे व्यवसाय से सम्बंधित होता है , यदि दुसरे घर के स्वामी का सम्बन्ध दसवे घर से हो तो जातक व्यवसाय द्वारा धन अर्जित करने में सक्षम होता है!
     प्रथम भाव स्वामी का  सम्बन्ध 2 या 11 वें घर के मालिक ग्रहों से केंद्र अथवा त्रिकोण में बने तो अपार धन योग का निर्माण होता है ! !
ग्यारहवां घर हमारी रोजाना की कमाई को दर्शाता है , अच्छी कमाई के लिए इस घर के स्वामी का सम्बन्ध प्रथम,द्वितीय अथवा दशवे घर या उनके स्वामियों से होना चाहिए! इस प्रकार ज्योतिष में बहुत से ऐंसे  ऐसे योग ,दशाओं व गोचरीय प्रभाव है जो जातक को धनवान बनाने के लिए आवश्यक होते हैं।
धन से संबंधित समस्याओं का ज्योतिष द्वारा समाधान पाने के लिए संपर्क करे

ज्योतिष " पीड़ा "विश्वासघात

आज कल के परतिसपरधातमक युग में हर कोई अपने आप को लेकर कुछ न कुछ करके कामयाब होना चाहता है चलो आज ईसी पर बात करते हैं
"विश्वासघात ,पीड़ा और ज्योतिष "

।। कभी मुझको साथ लेकर कभी मेरे साथ चलकर।
वो बदल गये अचानक मेरी जिंदगी बदलकर ।।

दोस्त, और अपने जब बदलते है इक टीस, खलिश,पीड़ा दे जाते है,मगर धोखा खाते कौन है,?तड़पन पाते कौन है,विरह और विछोह की अगन में जलता कौन है?

ज्योतिषशास्त्र यहाँ भी कभी मात नही खाता:--

अपने बदलते है तो चोट लगती कहा है, मन,दिल,दिमाग मे ही ना ।

कुछ आजमाये हुए ज्योतिषीय सूत्र :-

 1.कुंडली का चतुर्थ भाव,चतुर्थेश कमज़ोर, पीड़ित, पाप मध्य हो,पाप और क्रूर ग्रह यहां हो इंसान का दिल तड़फता,और रोता है,।कई बार भले ही वो सभी को हंसता,मुस्कराता ही दिखता हो, कोई पीड़ा उसे सालती ज़रूर है।ये पीड़ा अधिकांश अपने और बहुत अपने ही देते है।

2,पंचम भाव,पंचमेश,कमज़ोर,
पीड़ित,पाप मध्य हो या/ और पाप,क्रूर ग्रह यहां हो तो आघात,पीड़ा मानसिक हो जाती है।अक्सर प्रेम,प्रणय सम्बन्धो में,( और शेयर बाज़ार पर भरोसा कर के भी) धोखा ऐसे जातक ही खाते है।

ये और बात है कि-
" अहले दिल यूं भी निभा लेते है ,
दर्द सिने में छुपा लेते है"।

मेरे जो मित्र ज्योतिष की इन क्लिष्ट बातो का आनन्द ना ले पाये हो उनसे क्षमा चाहता हूं।
 आपके जीवन मे शुभता आये
पं मोहन

।। मृत्यु, ज्योतिष और मारकेश ।।



 अक्सर ज्योतिषी किसी की कुंडली मे मारकेश की दशा,अंतर्दशा देखते ही सामने बैठे परामर्श लेने आये व्यक्ति की सांसें अटका देते है यह कह कर कि "मारकेश चल रहा है,जीवन को खतरा है"।
  जबकि शास्त्र कहते है:-
 "व्यथा दुःख भयं, लज्जा, रोगः शौकस्तथैव च।
    मरणं चापमानं   च   मृत्युरष्टविधः स्मृतः।।

अर्थात मृत्यु के आठ रूप है
1 व्यथा
2 लगातार दुःखों से त्रस्तता
3 सदैव शत्रुओं से भय
4 हर जगह लज़्ज़ित
5असाध्य रोग से पीड़ित
6अनवरत शोक(प्रियजनों की मृत्यु से)
7 देह से प्राण निकलना
8 भरी सभा मे अपमानित होना

मारक दशा,अंतर्दशा में इनमे से किसी घटना/दुर्घटना के अवसरों से पाला पड़ता है इसलियें मृत्यु का डर दिखाने से ज्योतिषी को बचना चाहिये।
  ।।सुप्रभात।।
ज्योतिष, तांत्रिक निराकरण हेतु संपर्क

Sunday, 20 August 2017

अतिरिक्त करें यह प्रयोग खुशबुओं द्वारा भाग्य चमकाय


यूं तो यह सच है कि कर्म से भाग्य बनता-बिगड़ता है किंतु कभी-कभी कई ऐसी भी बातें होती हैं जिनसे भाग्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। भाग्य ‘सोने’ की तरह है जिस प्रकार सोने में स्वयं चमक होती है किंतु उसे चमकाने के लिए अनेक वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार भाग्य को चमकाने में खुशबू का भी प्रयोग किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र में भाग्य चमकाने के लिए तंत्र-मंत्रों के अतिरिक्त रत्नों, जड़ी-बूटियों आदि का भी प्रयोग किया जाता है । अगर भाग्य साथ दे तो कर्म भी यश-समृद्धि दिलवाता है। भाग्य के साथ न देने पर कर्म भी निष्क्रिय हो जाता है। इत्र-परफ्यूम आदि खुशबुओं द्वारा भाग्य को कैसे चमकाया जाए इससे संबंधित कुछ विशिष्ट जानकारियां यहां दी जा रही हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मेष से लेकर मीन राशि तक बारह राशियां होती हैं। इन्हीं बारह राशियों के अंदर संसार के सभी नाम आते हैं। प्रत्येक राशि का अपना एक तत्व, अपना एक स्वरूप, अपनी एक दिशा भी होती है। इन सभी बातों को ध्यान में रख कर अगर खुशबुओं का इस्तेमाल किया जाए तो निश्चय ही भाग्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
मेष, सिंह तथा धनु राशि वालों का ‘अग्रि’ तत्व प्रमुख है।
मेष राशि वालों को नींबू की खुशबू वाला परफ्यूम लगाना लाभकारी माना जाता है।
इसी तरह सिंह राशि वालों के लिए चंदन, देवदार एवं अम्बर की खुशबू वाला परफ्यूम लाभकारी माना गया है।
धनु राशि वालों को चंदन एवं कस्तूरी की खुशबू वाला परफ्यूम लगाना लाभदायक है। उ
परोक्त प्रकार से खुशबुओं का प्रयोग करके किसी कार्य को प्रारंभ करने या किसी कार्य के लिए घर से निकलने पर सफलता मिलती है।
वृष, कन्या तथा मकर राशि वालों में ‘भूमि’ तत्व प्रमुख है।
वृष राशि वालों को लिली एवं गुलाब की खुशबू वाला परफ्यूम लाभदायक माना गया है।
वृष राशि वाला व्यक्ति अगर किसी कला से जुड़ा हुआ हो तो उन्हें ये परफ्यूम सफलता दिलवाते हैं।
कन्या राशि वालों को चमेली का परफ्यूम तथा
मेष राशि वालों के लिए वनीला एवं कस्तूरी का परफ्यूम प्रयोग करते रहने से सफलता उनके कदम चूमती है।
अगर पति मीन राशि का और पत्नी कन्या राशि की है तथा दोनों में यौन संबंध संतुष्टिदायक नहीं हैं तो पति को वनीला का परफ्यूम तथा पत्नी को चमेली का परफ्यूम लगाकर शयनागार में जाना चाहिए।
मिथुन, तुला एवं कुंभ राशि वालों का वायु तत्व प्रमुख है। इनमें मिथुन राशि वालों को नींबू एवं गुलाब का परफ्यूम फायदेमंद माना जाता है। तुला राशि वाले व्यक्तियों को चंदन एवं लिली का परफ्यूम तथा कुंभ राशि वाले व्यक्तियों के लिए चंदन एवं नींबू की खुशबू वाला परफ्यूम सफलता दिलाने वाला होता है। किसी भी कार्य से घर से बाहर निकलते समय अगर इन खुशबुओं को प्रयोग करके निकलें तो सफलता अवश्य ही मिलती है।
कर्क, वृश्चिक एवं मीन राशि वालों का जल तत्व प्रमुख है।
कर्क राशि वालों को गुलाब एवं लिली की खुशबू वाला परफ्यूम तथा वृश्चिक राशि वालों के लिए वनीला एवं नींबू का परफ्यूम लाभदायक माना जाता है।
मीन राशि वालों को सभी प्रकार के परफ्यूम लाभकारी रहते हैं किंतु गुलाब एवं वनीला का परफ्यूम सबसे उत्तम माना जाता है।
‘‘खुशबू प्रसन्नता प्रदान करने वाली वस्तु है। जब जातक के मन में खुशबू के माध्यम से प्रसन्नता रूपी उत्तेजना जागृत होती है तो मन का तनाव समाप्त हो जाता है तथा हर क्षेत्र में सफलता की राह खुल जाती है।’’
तनाव को असफलता का द्योतक माना जाता है, अत: राशि अनुसार परफ्यूम का प्रयोग करके सफलता प्राप्त की जा सकती है।

Saturday, 19 August 2017

निश्चित मिलेगा लाभ आजमाएं ये आसान टोटके, धन संबंधी कार्य में सफलता चाहते हैं तो

करोड़पति बनने के लिए
दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति करोड़पति बनना चाहता है उसके लिए मेहनत तो सब करते हैं, लेकिन हर व्यक्ति करोड़पति नहीं बनता। इसकी वजह है चुनिंदा आदतें। अपने दम पर अमीर बनने वालों में टालमटोल की आदत नहीं होती है। वे पैसे का बेहतर इस्तेमाल करते हैं। उन्हें गुस्सा भी कम आता है।

1. धन संबंधी कार्य में सफलता चाहते हैं तो एक नींबू के ऊपर चार लौंग गाड़ दें और ‘ओम श्री हनुमंते नमः’ मंत्र का जाप 21 बार करें। इसके बाद उस लौंग वाले नींबू को अपने साथ रख लें। ऐसा करने से आपके सारे काम सफल हो जाएंगे और आपको करोड़पति बनने से कोई नहीं रोक पाएगा।

2. अगर आपका धन संबंधी कोई कार्य आपकी इच्छा के विरुद्ध हो रहा है, तो इसके लिए आप कपूर और एक फूल वाली लौंग एक साथ जलाकर तीन-चार दिन में थोड़ी-थोड़ी खा लें, ऐसा करने से जो काम आपकी इच्छा के विरुद्ध हो रहा है, वो बंद हो जाएगा और मनचाहा काम होने लगेगा और धन की वर्षा होगी।

3. एक दीपक लें और उसमें 7-8 लौंग डालकर शनिवार की शाम को घर के किसी कोने में रखकर जला दें। इसे आप 7 शनिवार तक लगातार करें. ऐसा करने से घर से सारी नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है और लक्ष्मी का आगमन होता है।

4. सुबह पूजा के बाद आरती करते समय अपने दीपक में दो लौंग डालकर आरती करें। या कपूर में दो फूल वाले लौंग डालकर आरती करें। इससे आपके सारे काम आसानी से बनने लगेंगे और किसी प्रकार की बाधा नहीं आएगी।
5. कच्ची घानी के तेल के दीपक में लौंग डालकर हनुमान जी की आरती करने से अनिष्ट दूर होता है और अचानक धन की प्राप्ति होती है। ये आसान से करोड़पति बनने के टोटके आपके जीवन को संवारकर खुशियों से भरने वाले हैं। तो दोस्तों क्यों ना आप भी लौंग के छोटे से प्रयोग से अपनी किस्मत के तारे चमकाएं।

Friday, 18 August 2017

किसी भी व्यक्ति को गुप्त शत्रु के अभिचारक कामों से बचाव हेतू उपाय



१. पीली सरसों, गुग्गल, लोबान व गौघृत इन सबको मिलाकर इनकी धूप बना लें व सूर्यास्त के 1 घंटे भीतर उपले जलाकर उसमें डाल दें। ऐसा २१ दिन तक करें व इसका धुआं पूरे घर में करें। इससे नकारात्मक शक्तियां दूर भागती हैं।
२. जावित्री, गायत्री व केसर लाकर उनको कूटकर गुग्गल मिलाकर धूप बनाकर सुबह शाम २१ दिन तक घर में जलाएं। धीरे-धीरे तांत्रिक अभिकर्म समाप्त होगा।
३. गऊ, लोचन व तगर थोड़ी सी मात्रा में लाकर लाल कपड़े में बांधकर अपने घर में पूजा स्थान में रख दें। शिव कृपा से तमाम टोने-टोटके का असर समाप्त हो जाएगा।
४. घर में साफ सफाई रखें व पीपल के पत्ते से ७ दिन तक घर में गौमूत्र के छींटे मारें व तत्पश्चात् शुद्ध गुग्गल का धूप जला दें।
५. कई बार ऐसा होता है कि शत्रु आपकी सफलता व तरक्की से चिढ़कर तांत्रिकों द्वारा अभिचार कर्म करा देता है। इससे व्यवसाय बाधा एवं गृह क्लेश होता है अतः इसके दुष्प्रभाव से बचने हेतु सवा 1 किलो काले उड़द, सवा 1 किलो कोयला को सवा 1 मीटर काले कपड़े में बांधकर अपने ऊपर से २१ बार घुमाकर शनिवार के दिन बहते जल में विसर्जित करें व मन में हनुमान जी का ध्यान करें। ऐसा लगातार ७ शनिवार करें। तांत्रिक अभिकर्म पूर्ण रूप से समाप्त हो जाएगा।
६. यदि आपको ऐसा लग रहा हो कि कोई आपको मारना चाहता है तो पपीते के २१ बीज लेकर शिव मंदिर जाएं व शिवलिंग पर कच्चा दूध चढ़ाकर धूप बत्ती करें तथा शिवलिंग के निकट बैठकर पपीते के बीज अपने सामने रखें। अपना नाम, गौत्र उच्चारित करके भगवान् शिव से अपनी रक्षा की गुहार करें व एक माला महामृत्युंजय मंत्र की जपें तथा बीजों को एकत्रित कर तांबे के ताबीज में भरकर गले में धारण कर लें।
७. शत्रु अनावश्यक परेशान कर रहा हो तो नींबू को ४ भागों में काटकर चौराहे पर खड़े होकर अपने इष्ट देव का ध्यान करते हुए चारों दिशाओं में एक-एक भाग को फेंक दें व घर आकर अपने हाथ-पांव धो लें। तांत्रिक अभिकर्म से छुटकारा मिलेगा।
८. शुक्ल पक्ष के बुधवार को ४ गोमती चक्र अपने सिर से घुमाकर चारों दिशाओं में फेंक दें तो व्यक्ति पर किए गए तांत्रिक अभिकर्म का प्रभाव खत्म हो जाता है।

क्यों उचित नहीं हाथ मिलाना




पुरातन समय में हाथ जोड़कर तथा साष्टांग प्रणाम कर अभिवादन करने की परंपरा हमारे समाज में थी जबकि वर्तमान समय में अभिवादन का प्रचलित स्वरूप हाथ मिलाना है जो कि पाश्चात्य संस्कृति की देन है। हाथ जोड़कर तथा साष्टांग प्रणाम कर अभिवादन करने से पीछे हमारे मनीषियों का तर्क था कि यथासंभव अपने शरीर का दूसरे के शरीर से स्पर्श किए बिना ही अभिवादन की प्रक्रिया पूरी हो जाए। नमस्कार करते समय दायां हाथ बाएं हाथ से जुड़ता है। शरीर में दाईं ओर झड़ा और बांईं ओर पिंगला नाड़ी होती है तथा मस्तिष्क पर त्रिकुटि के स्थान पर शुष्मना का होना पाया जाता है। अत: नमस्कार करते समय झड़ा, पिंगला के पास पहुंचती है तथा सिर श्रृद्धा से झुका हुआ होता है। इससे शरीर में आध्यात्मिकता का विकास होता है।
जबकि हाथ मिलाने से हम अपने शरीर की ऊर्जा के परिमंडल में अनावश्यक रूप से दूसरे को घुसपैठ करने का अवसर प्रदान करते हैं। हाथ मिलाने से दो शरीरों की ऊर्जा आपस टकराती है जिसका विपरीत प्रभाव न सिर्फ शरीर बल्कि मस्तिष्क पर भी पड़ता है। भारतीय समाज में स्त्रियों से हाथ मिलाकर अभिवादन करना वर्जित है। इसके पीछे और कोई कारण हो न हो पर शरीर की विद्युतीय तरंगता का प्रभाव निश्चित रूप से कार्य करता है। अत: स्पर्श से बचते हुए नमस्कार करना ही अभिवादन का उचित माध्यम है।                

Saturday, 12 August 2017

हनुमान जी की पूजा समस्त परेशानियों का सर्वनाश......



भगवान वाल्मीकि जी के अनुसार महाकपि केसरी सुमेरू पर्वत पर शासन करते थे।
महाकपि केसरी और अंजनी के पुत्र हनुमान ‘केसरी नंदन’ कहलाए।
प्रभु श्री राम के परम भक्त श्री हनुमान जी के आते ही सभी प्रकार के भूत-प्रेत भाग जाते हैं।
अष्ट सिद्धियां और नव निधियां जिनके समक्ष नृत्य करती हैं ऐसे वीर हनुमान कलियुग में सभी के सहायक बनते हैं।
कलियुग में सभी कामनाओं की पूर्ति के लिए नियम से 40 दिन तक श्री हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। इससे बल एवं बुद्धि जागृत होती है और व्यक्ति खुद अपनी शक्ति, भक्ति और कर्तव्यों का आंकलन कर सकता है।
हनुमान जी की पूजा करने से समस्त परेशानियों का सर्वनाश  होता हैं। बजरंगबली को लेकर बहुत से टोटके हैं। कहा जाता है कि इन टोटको से ‍विशेष रूप से धन प्राप्ति के साधन बनते हैं।
इतना ही नहीं इन टोटको से हर प्रकार का अनिष्ट भी दूर होता हैं।
मंगलवार और हनुमना जयंती के दिन संकटमोचन की पूजा मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली मानी गई है।
यदि आप पैसों की समस्याओं से मुक्ति पाना चाहते हैं तो यहां कुछ चमत्कारी उपाय बताए जा रहे हैं। शाम के समय मिट्टी के दीपक में रूई की बत्ती और सरसों का तेल डालें।
हनुमानजी के मंत्रों का जप करते हुए दीपक जला दें।
श्री हनुमंते नम:
अतुलित बलधामं, हेमशैलाभदेहं।
दनुजवनकृशानुं, ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुण निधानं, वानराणामधीशं।
रघुपतिप्रिय भक्तं, वातजातं नमामि।।
सुंदरकांड का पाठ करने से हनुमान जी बहुत जल्द शुभ फल प्रदान करते हैं।
श्री राम के मंत्रों का जप करने वाले भक्त पर हनुमान जी अति प्रसन्न होते हैं और सदैव कृपा बनाए रखते हैं।
कच्ची धानी के तेल का दीपक जलाकर हनुमान जी की आरती करें।
ऐसा करने से संकट दूर होगा और धन की प्राप्ति होगी।
एक नारियल पर कामिया सिन्दूर, मौली, अक्षत रखकर हनुमान जी के मंदिर में रखें इससे धन लाभ होगा।

ये सरल उपाय,करने से बाधाएं होंगी दूर .....




कई बार व्यक्ति अधिक मेहनत करता है लेकिन उसे उन्नति नहीं मिलती। इसके पीछे कुंडली दोष भी हो सकते हैं। जो व्यक्ति की प्रमोशन में बाधक बनते हैं। प्रतिदिन कुछ सरल उपाय करने से प्रमोशन अौर कुंडली दोेषों को दूर किया जा सकता है। सात प्रकार का अनाज जैसे गेहूं, मक्का, बाजरा, चावल, चना, ज्वार अौर साबूत मूंग लें। इन सभी को मिलाकर पक्षियों को खिलाएं। इससे कार्य में सफलता मिलेगी। सुबह शीघ्र उठकर स्नानादि कार्यों से निवृत होकर तांबे के लोटे में जल लेकर उसमें साबूत लाल मिर्च दे दाने डालें। उसके बाद इस जल को सूर्यदेव को अर्पित करें। इसके साथ ही सूर्य मंत्र का जाप भी करें। इससे उन्नति में आ रही बाधाएं दूर होंगी अौर व्यक्ति को मान-प्रतिष्ठा मिलेगी। कार्य पर जाते समय सबसे पहले अपना दायां पैर बाहर रखें। यदि रास्ते में गाय दिखाई दे तो उसे हरी घाय खिलाएं। ऐसा करने से पूरा दिन सकारात्मकता बनी रहेगी।
घर में जब खाना बनाए तो पहली रोटी गाय अौर अंतिम वाली कुत्ते को खिलाएं। ऐसा करने से जीवन की सारी नकारात्मक बातें दूर हो जाएगी अौर सफलता कदम चूमेगी।
नहाने के पानी में काले तिल डालकर स्नान करें। इससे शनिदेव से संबंधित दोषों का नाश हो जाएगा अौर कार्यों में आ रही बाधाएं भी दूर हो जाएगी।




Friday, 11 August 2017

नीम का पेड़.....


अगर आपके घर के सामने नीम का पेड़ है तो आप वाकई बहुत भाग्यशाली हैं। गर्मी में ठंडी हवा देने के साथ ही ये एक ऐसा पेड़ है जिसका हर हिस्सा किसी न किसी बीमारी के इलाज में कारगर है। इतना ही नहीं विभि‍न्न प्रकार के सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माण में भी नीम को प्रमुख रूप से इस्तेमाल किया जाता है।अगर आप खाना बनाते वक्त या किसी दूसरे कारण से अपना हाथ जला बैठी हैं तो तुरंत उस जगह पर नीम की पत्तियों को पीसकर लगा लें। इसमें मौजूद एंटीसेप्टिक गुण घाव को ज्यादा बढ़ने नहीं देता है। कान दर्द में अगर आपके कान में दर्द रहता है तो नीम का तेल इस्तेमाल करना काफी फायदेमंद रहेगा. कई लोगों में कान बहने की भी बीमारी होती है, ऐसे लोगों के लिए भी नीम का तेल एक कारगर उपाय है।दांतों के लिए
कुछ वक्त पहले तक नीम की दातुन, ब्रश की तुलना में ज्यादा लोकप्रिय थी. एक ओर जहां दांतों और मसूड़ों की देखभाल के लिए हम तरह-तरह के महंगे टूथपेस्ट इस्तेमाल करते हैं वहीं नीम की दातुन अपने आप में पर्याप्त होती है. नीम की दातुन पायरिया की रोकथाम में भी कारगर होती है।बालों के लिए भी है फायदेमंद
नीम एक बहुत अच्छा कंडीशनर होता है।नीम का जितना हो उतने पौधे अपने बगीचे में लगाये।इससे आपका बुध ग्रह भी मजबूत होता है

Tuesday, 8 August 2017

किस दिशा में होगी ससुराल कुंडली में देखे ?



ससुराल कि दिशा व स्थान का निर्धारण कुंडली में
शुक्र कि स्थिति से किया जाता है| शुक्र यदि शुभ
स्थान, राशि में हो व कोई भी पाप ग्रह उसे नहीं देख
रहा हो तो ससुराल स्थानीय या आसपास होती है|
यदि चतुर्थ भाव, चतुर्थेश व शुक्र किसी पाप ग्रह से
देखे जा रहे हों या शुक्र 6 , 8 , 12 वें भाव में हो तो जन्म
स्थान से दूर कन्या का ससुराल होता है| विवाह
जन्म स्थान से किस दिशा में होगा इसका निर्धारण भी
शुक्र से ही किया जाता है| कुंडली में जहां शुक्र स्थित है
उस से सातवें स्थान पर जो राशि स्थित है उस राशि के
स्वामी की दिशा में ही विवाह होता है| ग्रहों के
स्वामी व उनकी दिशा निम्न प्रकार है:-
राशि स्वामी दिशा
मेष, वृश्चिक मंगल दक्षिण
वृषभ , तुला शुक्र अग्नि कोण (दक्षिण-पूर्व)
मिथुन, कन्या बुध उत्तर
कर्क चंद्रमा वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम)
सिंह सूर्य( पूर्व)
धनु, मीन गुरु ईशान (उत्तर-पूर्व)
मकर, कुम्भ शनि (पश्चिम)
मतान्तर से मिथुन के स्वामी राहु व धनु के स्वामी केतु
माने गए हैं तथा इनकी दिशा नैऋत्य (दक्षिण- पश्चिम) कोण मानी गयी है| उदाहरण के लिए किसी कन्या का जन्म लग्न मेष है व शुक्र उसके पंचम भाव में बैठे हैं तो शुक्र से 7 गिनने पर
11 वां भाव आता है, जहां कुम्भ राशि है| इसके
स्वामी शनि हैं| राशि कि दिशा पश्चिम है| इसलिए
इस कन्या का ससुराल जन्म स्थान से पश्चिम दिशा
में होगा| कन्या के पिता को चाहिए कि वह इस
दिशा से प्राप्त विवाह प्रस्तावों पर प्रयास करें ताकि समय
व धन की बचत हो|

अपने कुलदेवता को कैसे जाने ?




आज के समय में बहुतायत में पाया जा रहा है की लोगों को अपने कुलदेवता/देवी का पता ही नहीं है |वर्षों से कुलदेवता/देवी को पूजा नहीं मिल रही है |घर-परिवार का सुरक्षात्मक आवरण समाप्त हो जाने से अनेकानेक समस्याएं अनायास घेर रही हैं |नकारात्मक उर्जाओं की आवाजाही बेरिक टोक हो रही है |वर्षीं से स्थान परिवर्तन के कारण पता ही नहीं है की हमारे कुलदेवता/देवी कौन है |कैसे उनकी पूजा होती है |कब उनकी पूजा होती है |आदि आदि |इस हेतु एक प्रभावी प्रयोग है जिससे यह जाना जा सकता है की आपके कुलदेवता कौन है | यह एक साधारण किन्तु प्रभावी प्रयोग है जिससे आप अपने कुलदेवता अथवा देवी को जान सकते हैं |

 प्रयोग को मंगलवार से शुरू करें और ११ मंगलवार तक करते रहें | मंगलवार को सुबह स्नान आदि से स्वच्छ पवित्र हो अपने देवी देवता की पूजा करें |फिर एक साबुत सुपारी लेकर उसे अपना कुलदेवता/देवी मानकर स्नान आदि करवाकर ,उस पर मौली लपेटकर किसी पात्र में स्थापित करें |इसके बाद आप अपनी भाषा में उनसे अनुरोध करें की "हे कुल देवता में आपको  जानना चाहता हूँ ,मेरे परिवार से आपका विस्मरण हो गया है ,हमारी गलतियों को क्षमा करते हुए हमें अपनी जानकारी दें ,इस हेतु में आपका यहाँ आह्वान करता हूँ ,आप यहाँ स्थान ग्रहण करें और मेरी पूजा ग्रहण करते हुए अपने बारे में हमें बताएं |इसके बाद उस सुपारी का पंचोपचार पूजन करें |अब रोज रात को उस सुपारी से प्रार्थना करें की हे कुल्द्वता/देवी में आपको जानना चाहता हूँ ,कृपा कर स्वप्न में मार्गदर्शन दीजिये |फिर सुपारी को तकिये के नीचे रखकर सो जाइए |सुबह उठाकर पुनः उसे पूजा स्थान पर स्थापित कर पंचोपचार पूजन करें |यह क्रम प्रथम मंगलवार से ११ मंगलवार तक जारी रखें |हर मंगलवार को व्रत रखें |इस अवधि के दौरान शुद्धता का विशेष ध्यान रखें ,यहाँ तक की बिस्तर और सोने का स्थान तक शुद्ध और पवित्र रखें |ब्रह्मचर्य का पालन करें और मांस-मदिरा से पूर्ण परहेज रखें |  इस प्रयोग की अवधि के अन्दर आपको स्वप्न में आपके कुलदेवता/देवी की जानकारी मिल जायेगी |अगर खुद न समझ सकें तो योग्य जानकार से स्वप्न विश्लेषण करवाकर जान सकते हैं |इस तरह वर्षों से भूली हुई कुलदेवता की समस्या हल हो जाएगी और पूजा देने पर आपके परिवार की बहुत सी समस्याएं समाप्त हो जायेंगी

उपयोग करें यह बहुत अच्छा महसूस करवा़येगी
जय श्री कृष्ण

कर्पूर दिव्य वानस्पतिक



कर्पूर एक उड़नशील दिव्य वानस्पतिक पदार्थ है। इसे अक्सर पुजा में आरती करते वक्त जलाया जाता है ।
शास्त्रो के अनुसार देवी-देवताओं के समक्ष कर्पूर जलाने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

प्रतिदिन सुबह और शाम कर्पूर को गाय के घी में भिगोकर जलाएं और संपूर्ण घर में उसकी खुशबू फैलाएं। ऐसा करने से घर की नकारात्मक उर्जा नष्ट हो जाएगी। घर मे सकारात्मक उर्जा का निर्माण होगा, अमन शांति बनी रहेगी है।

इसकी सुगंध से बीमारी फैलाने वाले जीवाणु नष्ट होते हैं, और वातावरण शुद्ध होता है।
घर के किसी स्थान पर वास्तु दोष निर्मित हो तो वहां कर्पूर की 2 टिकिया रख दें। जब वह टिकिया समाप्त हो जाए तब फिर दूसरी टिकिया रख दें। ऐसा करने से वास्तुदोष निर्मित नहीं होगा।

नकारात्मक उर्जा से घर को बचाने के लिए शौचालय और बाथरूप में कर्पूर की टिकियां अवश्य रखें ।

 उपयोग करें यह बहुत अच्छा महसूस करवा़येगी
जय श्री कृष्ण

Monday, 7 August 2017

शनि, राहु और केतु प्रसन्न करने के खास उपाय...




शनि के अनुचर हैं राहु और केतु। शरीर में इनके स्थान
नियुक्त हैं। सिर राहु है तो केतु धड़। यदि आपके गले
सहित ऊपर सिर तक किसी भी प्रकार की गंदगी या
खार जमा है तो राहु का प्रकोप आपके ऊपर मँडरा
रहा है और यदि फेफड़ें, पेट और पैर में किसी भी प्रकार
का विकार है तो आप केतु के शिकार हैं। राहु और केतु
की भूमिका एक पुलिस अधिकारी की तरह है जो
न्यायाधीश शनि के आदेश पर कार्य करते हैं। ‍शनि का
रंग नीला, राहु का काला और केतु का सफेद माना
जाता है। शनि के देवता भैरवजी हैं, राहु की
सरस्वतीजी और केतु के देवता भगवान गणेशजी है। शनि
का पशु भैंसा, राहु का हाथी और काँटेदार जंगली
चूहा तथा केतु का कुत्ता, गधा, सुअर और छिपकली है।
शनि का वृक्ष कीकर, आँक व खजूर का वृक्ष, राहु का
नारियल का पेड़ व कुत्ता घास और केतु का इमली का
दरख्त, तिल के पौधे व केला है। शनि शरीर के दृष्टि,
बाल, भवें, हड्डी और कनपटी वाले हिस्से पर, राहु सिर
और ठोड़ी पर और केतु कान, रीढ़, घुटने, लिंग और जोड़
पर प्रभाव डालता है।
राहु की मार : यदि व्यक्ति अपने शरीर के अंदर
किसी भी प्रकार की गंदगी पाले रखता है तो उसके
ऊपर काली छाया मंडराने लगती है अर्थात राहु के
फेर में व्यक्ति के साथ अचानक होने वाली घटनाएँ बढ़
जाती है। घटना-दुर्घटनाएँ, होनी-अनहोनी और
कल्पना-विचार की जगह भय और कुविचार जगह बना
लेते हैं। राहु के फेर में आया व्यक्ति बेईमान या
धोखेबाज होगा। राहु ऐसेव्यक्ति की तरक्की रोक
देता है। राहु का खराब होना अर्थात् दिमाग की
खराबियाँ होंगी, व्यर्थ के दुश्मन पैदा होंगे, सिर में
चोट लग सकती है। व्यक्ति मद्यपान या संभोग में
ज्यादा रत रह सकता है। राहु के खराब होने से गुरु भी
साथ छोड़ देता है। राहु के अच्छा होने से व्यक्ति में
श्रेष्ठ साहित्यकार, दार्शनिक,वैज्ञानिक या फिर
रहस्यमय विद्याओं के गुणों का विकास होता है।
इसका दूसरा पक्ष यह कि इसके अच्छे होने से राजयोग
भी फलित हो सकता है। आमतौर पर पुलिस या
प्रशासन में इसके लोग ज्यादा होते हैं।
केतु की मार : जो व्यक्ति जुबान और दिल से गंदा है
और रात होते ही जो रंग बदल देता है वह केतु का
शिकार बन जाता है। यदि व्यक्ति किसी के साथ
धोखा, फरेब, अत्याचार करता है तो केतु उसके पैरों से
ऊपर चढ़ने लगता है और ऐसे व्यक्ति के जीवन की
सारी गतिविधियाँ रुकने लगती है। नौकरी, धंधा,
खाना और पीना सभी बंद होने लगता है। ऐसा
व्यक्ति सड़क पर या जेल में सोता है घर पर नहीं।
उसकी रात की नींद हराम रहती है, लेकिन दिन में
सोकर वह सभी जीवन समर्थक कार्यों से दूर होता
जाता है। केतु के खराब होने से व्यक्ति पेशाब की
बीमारी, जोड़ों का दर्द, सन्तान उत्पति में रुकावट
और गृहकलह से ग्रस्त रहता है। केतु के अच्छा होने से
व्यक्ति पद, प्रतिष्ठा और संतानों का सुख उठाता है
और रात की नींद चैन से सोता है।
शनि की मार : पराई स्त्री के साथ रहना, शराब
पीना, माँस खाना, झूठ बोलना, धर्म की बुराई
करना या मजाक उड़ाना, पिता व पूर्वजों का
अपमान करना और ब्याज का धंधा करना प्रमुख रूप से
यह सात कार्य शनि को पसंद नहीं। उक्त में से जो
व्यक्ति कोई-सा भी कार्य करता है शनि उसके
कार्यकाल में उसके जीवन से शांति, सुख और समृद्धि
छिन लेता है। व्यक्ति बुराइयों के रास्ते पर चलकर खुद
बर्बाद हो जाता है। शनि उस सर्प की तरह है जिसके
काटने पर व्यक्ति की मृत्यु तय है। शनि के अशुभ
प्रभाव के कारण मकान या मकान का हिस्सा गिर
जाता है या क्षतिग्रस्त हो जाता है, नहीं तो कर्ज
या लड़ाई-झगड़े के कारण मकान बिक जाता है। अंगों
के बाल तेजी से झड़ जाते हैं। अचानक आग लग सकती
है। धन, संपत्ति का किसी भी तरह नाश होता है।
समय पूर्व दाँत और आँख की कमजोरी। शनि की
स्थिति यदि शुभ है तो व्यक्ति हर क्षेत्र में प्रगति
करता है। उसके जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट
नहीं होता। बाल और नाखून मजबूत होते हैं। ऐसा
व्यक्ति न्यायप्रीय होता है और समाज में मान-
सम्मान खूब रहता हैं।
बचाव का तरीका :
शनि के उपाय- सर्वप्रथम भैरवजी के मंदिर जाकरउनसे
अपने पापों की क्षमा माँगे। जुआ, सट्टा, शराब,
वैश्या से संपर्क, धर्म की बुराई, पिता-पूर्वजों का
अपमान और ब्याज आदि कार्यों से दूर रहें। शरीर के
सभी छिद्रों को प्रतिदिन अच्छे से साफ रखें। दाँत,
बाल और
नाखूनों की सफाई रखें। कौवे को प्रतिदिन रोटी
खिलाएँ। छायादान करें, अर्थात कटोरी में थोड़ा-
सा सरसो का तेल लेकर अपना चेहरा देखकर शनि
मंदिर में रख आएँ। अंधे,
अपंगों, सेवकों और सफाईकर्मियों से अच्छा व्यवहार
रखें। रात को सिरहाने पानी रखें और उसे सुबह कीकर,
आँक या खजूर के वृक्ष पर चढ़ा आएँ।
राहु के उपाय- सिर पर चोटी रख सकते हैं, लेकिन
किसी लाल किताब के विशेषज्ञ से पूछकर। भोजन
भोजनकक्ष में ही करें। ससुराल पक्ष से अच्छे संबंध रखें।
रात को सिरहाने मूली रखें और उसे सुबह किसी मंदिर
में दान कर दें।
केतु के उपाय- संतानें केतु हैं। इसलिए संतानों से संबंध
अच्छे रखें। भगवान गणेश की आराधना करें। दोरंगी
कुत्ते को रोटी खिलाएँ। कान छिदवाएँ। कुत्ता भी
पाल सकते हैं, लेकिन किसी लाल किताब के
विशेषज्ञ से पूछकर।
राहु-केतु और शनि को प्रसन्न करने के खास उपाय :
शनि को प्रसन्न करने के लिए बताए गए खास उपायों
में से एक उपाय है, किसी कुत्ते को तेल चुपड़ी हुई रोटी
खिलाना। अधिकतर लोग प्रतिदिन कुत्ते को रोटी
तो खिलाते ही हैं ऐसे में यदि रोटी पर तेल लगाकर
कुत्ते को खिलाई जाए तो शनि के दोषों से मुक्ति
मिलती है।
कुत्ता शनिदेव का वाहन है और जो लोग कुत्ते को
खाना खिलाते हैं उनसे शनि अति प्रसन्न होते हैं।
शनि महाराज की प्रसन्नता के बाद व्यक्ति को
परेशानियों के कष्ट से मुक्ति मिल जाती है।
साढ़ेसाती हो या ढैय्या या कुंडली का अन्य कोई
दोष इस उपाय से निश्चित ही लाभ होता है।
कुत्ते को तेल चुपड़ी रोटी खिलाने से शनि के साथ
ही राहु-केतु से संबंधित दोषों का भी निवारण हो
जाता है। राहु-केतु के योग कालसर्प योग से पीड़ित
व्यक्तियों को यह उपाय लाभ पहुंचाता है। इसके
अलावा निम्न मंत्रों से भी पीड़ित जातकों को
अत्यंत फायदा पहुंचता है।
राहु मंत्र को अगर सिद्ध किया जाए तो राहु से
जुड़ी परेशानियां समाप्त होती हैं। ध्यान रहे कि
राहु मंत्र की माला का जाप 8 बार किया जाता
है।
राहु मंत्र-
ह्रीं अर्धकायं महावीर्य चंद्रादित्य विमर्दनम्।
सिंहिका गर्भ संभूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्।
ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:।
ॐ शिरोरूपाय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो राहु
प्रचोदयात्।
केतु मंत्र-
केतु मंत्र का जाप 8 बार किया जाता है।
ॐ पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रह मस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम।।
ॐ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम:।
ॐ पद्मपुत्राय विद्महे अमृतेशाय धीमहि तन्नो केतु:
प्रचोदयात्।

स्नान से समृद्धि

                                               





सुबह के स्नान को धर्म शास्त्र में चार उपनाम दिए है।

1  मुनि स्नान।
जो सुबह 4 से 5 के बिच किया जाता है।
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2  देव स्नान।
जो सुबह 5 से 6 के बिच किया जाता है।
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3  मानव स्नान।
जो सुबह 6 से 8 के बिच किया जाता है।
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4  राक्षसी स्नान।
जो सुबह 8 के बाद किया जाता है। 

▶मुनि स्नान सर्वोत्तम है।
▶देव स्नान उत्तम है।
▶मानव स्नान समान्य है।
▶राक्षसी स्नान धर्म में निषेध है।
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किसी भी मानव को 8 बजे के बाद स्नान नही करना चाहिए।
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मुनि स्नान .......
घर में सुख ,शांति ,समृद्धि, विध्या , बल , आरोग्य , चेतना , प्रदान करता है।
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देव स्नान ......
 आप के जीवन में यश , किर्ती , धन वैभव,सुख ,शान्ति, संतोष , प्रदान करता है।
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मानव स्नान.....
काम में सफलता ,भाग्य ,अच्छे कर्मो की सूझ ,परिवार में एकता , मंगल मय , प्रदान करता है।
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राक्षसी स्नान.....
 दरिद्रता , हानि , कलेश ,धन हानि , परेशानी, प्रदान करता है ।
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किसी भी मनुष्य को 8 के बाद स्नान नही करना चाहिए।
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पुराने जमाने में इसी लिए सभी सूरज निकलने से पहले स्नान करते थे।

खास कर जो घर की स्त्री होती थी। चाहे वो स्त्री माँ के रूप में हो,पत्नी के रूप में हो,बेहन के रूप में हो।
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घर के बडे बुजुर्ग यही समझाते सूरज के निकलने से पहले ही स्नान हो जाना चाहिए।

वास्तु विचार नैऋत्य कोण

                                            



आज हम बात करते है नैऋत्य कोण के बारे में।पीने का पानी कभी भी नैऋत्य कोण में नही रखना चाहिए इससे जल स्वादहीन हो जाता है।जल का कारक चन्द्रमा मन जाता है।नैऋत्य कोण का स्वामी राहु होता है।राहु के स्थान में चन्द्रमा होने से चंद्रमा दूषित हो जाता है ज्योतिष शास्त्र में ग्रहण की स्थिति बताई जाती है चन्द्रमा और राहु की युक्ति को।अगर आपका किचन नैऋत्य कोण में है तो उस रसोई में बनाने वाले पदार्थ या खाने में मधुरता का आभाव होगा।उस रसोई में बने खाने को खाके परिवार में रहने वालो का स्वस्थ्य ठीक नही रहेगा।गृहणी हमेसा गुस्से में रहेंगे। आपसी मतभेद हमेशा रहेगा।गृहणियों की मानसिक स्थिति ठीक नही रहेगी।पश्चिम और नैऋत्य दिशाओं से आने वाली किरणों से भोजन की मधुरता खत्म हो जायेगी। नैऋत्य कोण में अगर सेफ्टी टैंक हो तो अवश्य वहां नकरात्मक ऊर्जा रहेगी जिससे परिवार की सुख शांति धन ऐश्वर्य सब खत्म हो जायेगा।गृहस्वामी जितना धन भी अर्जित करेंगे सब व्यथ होता जायेगा।कुछ भी सुख नही मिलेगा।नैऋत्य कोण में कुछ न हो यहाँ केवल अनावश्यक चीज़े रख सकते है।उचित उपाय करके समस्या से निकाला जा सकताहैं

राहु द्वारा निर्मित शुभ योग

                                 


अष्टलक्ष्मी योग -
वैदिक ज्योतिष में राहु नैसर्गिक पापी ग्रह के रूप में जाना जाता है.इस ग्रह की अपनी कोई राशि नहीं है अत: जिस राशि में होता है उस राशि के स्वामी अथवा भाव के अनुसार फल देता है.राहु जब छठे भाव में स्थित होता है और केन्द्र में गुरू होता है तब यह अष्टलक्ष्मी योग नामक शुभ योग का निर्माण करता है.  अष्टलक्ष्मी योग में राहु अपना पाप पूर्ण स्वभाव त्या ....?गकर गुरू के समान उत्तम फल देता है. अष्टलक्ष्मी योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में बनता है वह व्यक्ति ईश्वर के प्रति आस्थावान होता है.इनका व्यक्तित्व शांत होता है.इन्हें यश और मान सम्मान मिलता है.लक्ष्मी देवी की इनपर कृपा रहती है.
लग्न कारक योग -
राहु द्वारा निर्मित शुभ योगों में लग्न कारक योग  का नाम भी प्रमुख है. लग्न कारक योग  मेष, वृष एवं कर्क लग्न वालों की कुण्डली में तब बनता है जबकि राहु द्वितीय, नवम अथवा दशम भाव में नहीं होता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में लग्नकारक योग  उपस्थित होता है उसे राहु की अशुभता का सामना नहीं करना होता है. राहु इनके लिए शुभ कारक होता है जिससे दुर्घटना की संभावना कम रहती है.स्वास्थ्य उत्तम रहता है.आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है एवं सुखी जीवन जीते हैं.
परिभाषा योग -
जिस व्यक्ति की कुण्डली में राहु परिभाषा योगका निर्माण करता है.वह व्यक्ति राहु के कोप से मुक्त रहता है.यह योग जन्मपत्री में तब निर्मित होता है जब राहु लग्न में स्थित हो अथवा तृतीय, छठे या एकादश भाव में उपस्थित हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो.राहु का परिभाषा योग  व्यक्ति को आर्थिक लाभ देता है.स्वास्थ्य को उत्तम बनाये रखता है.इस योग से प्रभावित व्यक्ति के कार्य आसानी से बन जाते हैं.
कपट योग -
दो पापी ग्रह राहु और शनि जब जन्मपत्री में क्रमश: एकादश और षष्टम में उपस्थित होते हैं तो कपट योग बनता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में कपट योग  निर्मित होता है वह व्यक्ति अपने स्वार्थ हेतु किसी को भी धोखा देने वाला होता है .इनपर विश्वास करने वालों को पश्चाताप करना होता है.सामने भले ही लोग इनका सम्मान करते हों परंतु हुदय में इनके प्रति नीच भाव ही रहता है.
पिशाच योग -
पिशाच योग  राहु द्वारा निर्मित योगों में यह नीच योग है.पिशाच योग  जिस व्यक्ति की जन्मपत्री में होता है वह प्रेत बाधा का शिकार आसानी से हो जाता है.इनमें इच्छा शक्ति की कमी रहती है.इनकी मानसिक स्थिति कमज़ोर रहती है, ये आसानी से दूसरों की बातों में आ जाते हैं.इनके मन में निराशात्मक विचारों का आगमन होता रहता है.कभी कभी स्वयं ही अपना नुकसान कर बैठते हैं.
चांडाल योग -
चांडाल योग गुरू और राहु की युति से निर्मित होता है. चांडाल योग  अशुभ ग्रह के रूप में माना जाता है. चांडाल योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में निर्मित होता है उसे राहु के पाप प्रभाव को भोगना पड़ता है. चांडाल योग में आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है.नीच कर्मो के प्रति झुकाव रहता है.मन में ईश्वर के प्रति आस्था का अभाव रहता है.

जाप आदि में कोन सी माला सर्वोतम है ?



भगवान की पूजा के लिए मंत्र जप सर्वश्रेष्ठ उपाय है और पुराने समय से ही बड़े-बड़े तपस्वी, साधु-संत इस उपाय को अपनाते रहे हैं। जप के लिए माला की आवश्यकता होती है और इसके बिना मंत्र जप का फल प्राप्त नहीं हो पाता है।
रुद्राक्ष से बनी माला मंत्र जप के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। रुद्राक्ष को महादेव का प्रतीक माना गया है। रुद्राक्ष में सूक्ष्म कीटाणुओं का नाश करने की शक्ति भी होती है। साथ ही, रुद्राक्ष वातावरण में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा को ग्रहण करके साधक के शरीर में पहुंचा देता है।

पुण्यदायक नहीं संख्याहीन मंत्रों के जप



संख्याहीन मंत्रों के जप से नहीं मिलता है पूर्ण पुण्य
शास्त्रों में लिखा है कि-
बिना दमैश्चयकृत्यं सच्चदानं विनोदकम्।
असंख्यता तु यजप्तं तत्सर्व निष्फलं भवेत्।।
इस श्लोक का अर्थ है कि भगवान की पूजा के लिए कुश का आसन बहुत जरूरी है, इसके बाद दान-पुण्य जरूरी है। साथ ही, माला के बिना संख्याहीन किए गए मंत्र जप का भी पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता है। अत: जब भी मंत्र जप करें, माला का उपयोग अवश्य करना चाहिए।
मंत्र जप के लिए उपयोग की जाने वाली माला रुद्राक्ष, तुलसी, स्फटिक, मोती या नगों से बनी होती है। यह माला बहुत चमत्कारी प्रभाव रखती है। ऐसी मान्यता है कि किसी मंत्र का जप इस माला के साथ करने पर दुर्लभ कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।

माला में किसे कहते हैं सुमेरू.....




माला के दानों से मालूम हो जाता है कि मंत्र जप की कितनी संख्या हो गई है। जप की माला में सबसे ऊपर एक बड़ा दाना होता है जो कि सुमेरू कहलाता है। सुमेरू से ही जप की संख्या प्रारंभ होती है और यहीं पर खत्म भी। जब जप का एक चक्र पूर्ण होकर सुमेरू दाने तक पहुंच जाता है तब माला को पलटा लिया जाता है। सुमेरू को लांघना नहीं चाहिए।
जब भी मंत्र जप पूर्ण करें तो सुमेरू को माथे पर लगाकर नमन करना चाहिए। इससे जप का पूर्ण फल प्राप्त होता है।

108 की ज्योतिषय मान्यता




ज्योतिष के अनुसार ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 भागों के नाम मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन 12 राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अत: ग्रहों की संख्या 9 का गुणा किया जाए राशियों की संख्या 12 में तो संख्या 108 प्राप्त हो जाती है। माला के दानों की संख्या 108 संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करती है । एक अन्य मान्यता के अनुसार ऋषियों ने में माला में 108 दाने रखने के पीछे ज्योतिषी कारण बताया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुल 27 नक्षत्र बताए गए हैं। हर नक्षत्र के 4 चरण होते हैं और 27 नक्षत्रों के कुल चरण 108 ही होते हैं। माला का एक-एक दाना नक्षत्र के एक-एक चरण का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए किया जाता है माला का उपयोग जो भी व्यक्ति माला की मदद से मंत्र जप करता है, उसकी मनोकामनएं बहुत जल्द पूर्ण होती हैं। माला के साथ किए गए जप अक्षय पुण्य प्रदान करते हैं। मंत्र जप निर्धारित संख्या के आधार पर किए जाए तो श्रेष्ठ रहता है। इसीलिए माला का उपयोग किया जाता है।

माला में 108 दाने, क्यों होते है क्यों करते है मंत्र जाप के लिए माला का प्रयोग ?




हिन्दू धर्म में हम मंत्र जप के लिए जिस माला का उपयोग करते है, उस माला में दानों की संख्या 108 होती है। शास्त्रों में इस संख्या 108 का अत्यधिक महत्व होता है । माला में 108 ही दाने क्यों होते हैं, इसके पीछे कई धार्मिक, ज्योतषिक  और वैज्ञानिक मान्यताएं हैं। आइए हम यहां जानते है ऐसी ही चार मान्यताओ के बारे में तथा साथ ही जानेंगे आखिर क्यों करना चाहिए मन्त्र जाप के लिए माला का प्रयोग।
सूर्य की एक-एक कला का प्रतीक होता है माला का एक-एक दाना

एक मान्यता के अनुसार माला के 108 दाने और सूर्य की कलाओं का गहरा संबंध है। एक वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता है और वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छह माह उत्तरायण रहता है और छह माह दक्षिणायन। अत: सूर्य छह माह की एक स्थिति में 108000 बार कलाएं बदलता है।

इसी संख्या 108000 से अंतिम तीन शून्य हटाकर माला के 108 मोती निर्धारित किए गए हैं। माला का एक-एक दाना सूर्य की एक-एक कला का प्रतीक है। सूर्य ही व्यक्ति को तेजस्वी बनाता है, समाज में मान-सम्मान दिलवाता है। सूर्य ही एकमात्र साक्षात दिखने वाले देवता हैं, इसी वजह से सूर्य की कलाओं के आधार पर दानों की संख्या 108 निर्धारित की गई है।

माला में 108 दाने रहते हैं। इस संबंध में शास्त्रों में दिया गया है कि...
"षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकं विशांति।
एतत् संख्यान्तितं मंत्रं जीवो जपति सर्वदा।।"
इस श्लोक के अनुसार एक पूर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति दिनभर में जितनी बार सांस लेता है, उसी से माला के दानों की संख्या 108 का संबंध है। सामान्यत: 24 घंटे में एक व्यक्ति करीब 21600 बार सांस लेता है। दिन के 24 घंटों में से 12 घंटे दैनिक कार्यों में व्यतीत हो जाते हैं और शेष 12 घंटों में व्यक्ति सांस लेता है 10800 बार।

इसी समय में देवी-देवताओं का ध्यान करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर यानी पूजन के लिए निर्धारित समय 12 घंटे में 10800 बार ईश्वर का ध्यान करना चाहिए, लेकिन यह संभव नहीं हो पाता है। इसीलिए 10800 बार सांस लेने की संख्या से अंतिम दो शून्य हटाकर जप के लिए 108 संख्या निर्धारित की गई है। इसी संख्या के आधार पर जप की माला में 108 दाने होते हैं।

जय श्री कृष्ण


भारतीय ज्योतिष और मंत्र विज्ञान



भारतीय ज्योतिष और मंत्र विज्ञान में जीवन की आम समस्याओं के लिए बेहद प्रभावशाली समाधान दिए गए हैं। यदि आप को किसी वस्तु या व्यक्ति से डर लगता है तो एक साधारण से दिखने वाले परन्तु बेहद शक्तिशाली मंत्र का केवल मात्र 7 बार जप करना आपके डर को हमेशा के लिए दूर कर देगा। इस मंत्र के स्मरण मात्र से डर भाग जाता है, और अकस्मात आई बाधाओं का निवारण होता है। जब भी किसी प्रकार के कोई पशुजन्य या दूसरे तरह से प्राणहानि आशंका हो तब इस मंत्र का 7 बार जाप करना चाहिए। इस प्रयोग के लिए मात्र मंत्र याद होना जरूरी है। मंत्र कंठस्थ करने के बाद केवल 7 बार शुद्ध जाप करें व चमत्कार देंखे!

इस मंत्र जाप से दिखने लगता है भूत, भविष्य, वर्तमान




अगर इस मंत्र का एक हजार बार बिना रूके लगातार जाप कर लिया जाए तो व्यक्ति की स्मरण शक्ति विश्व के उच्चतम स्तर तक हो जाती है तथा वह व्यक्ति परम मेधावी बन जाता है! अगर इस मंत्र का बिना रूके लगातार 10,000 बार जप कर लिया जाए तो उसे त्रिकाल दृष्टि (भूत, वर्तमान, भविष्य का ज्ञान) की प्राप्ति हो जाती है! अगर इस मंत्र का बिना रूके लगातार एक लाख बार, रूद्राक्ष की माला के साथ, लाल वस्त्र धारण करके तथा लाल आसान पर बैठकर, उत्तर दिशा की और मुख करके शुद्ध जाप कर लिया जाये, तो उस व्यक्ति को खेचरत्व एवं भूचरत्व की प्राप्ति हो जायेगी!
मंत्र इस प्रकार है
ओम हं ठ ठ ठ सैं चां ठं ठ ठ ठ ह्र: ह्रौं ह्रौं ह्रैं क्षैं क्षों क्षैं क्षं ह्रौं ह्रौं क्षैं ह्रीं स्मां ध्मां स्त्रीं सर्वेश्वरी हुं फट् स्वाहा

Sunday, 6 August 2017

शारीरिक संबंध शास्त्रों के अनुसार





शास्त्रों के अनुसार रात 12 बजे बाद अगला दिन शुरु हो जाता है तथा ब्रह्मबेला से ठीक पहले वाला समय आरंभ हो जाता है। ऐसे समय पर व्यक्ति की मानसिक तथा आध्यात्मिक शक्तियां जागृत हो जाती हैं। इसीलिए मध्यरात्रि के एक प्रहर बाद से ब्रहम मुहूर्त आरम्भ हो जाता है ऐसे समय में व्यक्ति को अध्ययन, मनन, ध्यान तथा भगवान की पूजा-पाठ जैसे कार्य करने चाहिए। कोई नई योजना बनानी हो तो भी उसके लिए यह समय बहुत उपयुक्त है। परन्तु इस समय भूल कर भी शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए अन्यथा पुरुषत्व की हानि होने के साथ-साथ व्यक्ति का बुरा समय आरंभ हो जाता है। शारीरिक संबंध बनाने के लिए सर्वोत्तम समय बह्म मुहूर्त के प्रहर से पहले (अर्थात् सुबह 3 बजे से पहले) का ही ठीक माना जाता है

नींबू-लौंग




तांत्रिक ग्रंथों में कई ऐसे प्रयोगों के बारे में बताया गया हैजिनकी मदद से असंभव कार्य को भी संभव बनाया जा सकता है। इन प्रयोगों में विशेष पौधे, पूजा सामग्री, फल तथा अन्य चीजों का उपयोग होता है। तंत्र के अनुसार नींबू तथा लौंग के टोने-टोटके द्वारा जीवन की कई समस्याओं को एक झटके में खत्म किया जा सकता है।
यदि घर में किसी बच्चे या बड़े व्यक्ति को बुरी नजर लग जाए तो उसके सिर से पैर तक सात बार नींबू वार लें। इसके बाद इस नींबू के चार टुकड़े करके किसी सुनसान स्थान या किसी तिराहे पर फेंक दें। ध्यान रखें नींबू के टुकड़े फेंकने के बाद पीछे न देखें और सीधे घर आ जाएं। नजर तुरंत दूर हो जाएगी।
यदि किसी व्यक्ति का व्यापार ठीक से नहीं चल रहा है तो उसे शनिवार के दिन नींबू का तांत्रिक उपाय करना चाहिए। इस उपाय के अनुसार एक नींबू को दुकान की चारों दीवारों से स्पर्श कराएं। इसके बाद नींबू को चार टुकड़ों में अच्छे से काट लें और चौराहे पर जाकर चारों दिशाओं में नींबू का एक-एक टुकड़ा फेंक दें। इससे दुकान, व्यापार स्थल की नेगेटिव एनर्जी नष्ट हो जाएगी।
घर की नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने के लिए घर में नींबू का पेड़ लगाए। नींबू के पेड़ से आसपास का वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर रहता है। इसके साथ ही नींबू का पेड़ घर में लगाने से घर का वास्तु दोष भी दूर होता है।
प्रचलित मान्यता के अनुसार अगर सुई लगा नींबू किसी बीमार के सिर पर से 7 बार वार (उसार) कर चौराहे पर रख देना चाहिए। चौराहे से जाते हुए जो भी व्यक्ति उस नींबू को पार कर चला जाएगा या उसे स्पर्श करेगा तो बीमार व्यक्ति की सारी बीमारी उसको को लग जाती है।
यदि कोई व्यक्ति अचानक ही बीमार हो जाए तथा उस पर दवाओं का कोई असर न हों तो इसके लिए भी नींबू का उपाय किया जाता है। ऐसी स्थिति में एक साबूत नींबू के उपर काली स्याही से 307 लिख दें और उस व्यक्ति के उपर उल्टी तरफ से 7 बार उतारें। इसके पश्चात उसी नींबू को चार भागों में इस प्रकार से काटें कि वह नीचें से जुड़े रहें। और फिर उसी नींबू को घर से बाहर किसी निर्जन स्थान पा फेंक दें। इस उपाय को करने से पीडि़त व्यक्ति 24 घंटों के अंदर ही स्वस्थ हो जायेगा।
 हर हर महादेव
 6/8/17
16:15
अहमदगढ यदि इस प्रकार की कोई भी समस्या के लिए संपर्क करे...आपको अवश्य ही लाभ होगा
संपर्क करे 9814404724 वटसअप 9814404724

यदि आप पर आप पर तंत्र शक्ति प्रयोग की गई है किस तरह से पहचाने




(1) नाड़ी की गति सामान्य से अधिक हो जाती है: जब भी शरीर पर किसी भी नकारात्मक ऊर्जा का हमला होता है तो हमारा शरीर उसका प्रतिरोध करता है जिसके फलस्वरूप हमारी धड़कन सामान्य से तेज हो जाती है। जितना घातक अटैक होगा, नाड़ी की गति उतनी ही ज्यादा तेज हो जाएगी।
(2) श्वास की गति बढ़ जाती है: तांत्रिक हमला होते ही सांस की गति भी बहुत तेज हो जाती है। घातक हमले की हालत में श्वास की गति इतनी अधिक हो सकती है जितनी की भागदौड़ के बाद भी नहीं होती।
(3) अचानक ही शारीरिक तथा मानसिक रूप से कमजोरी महसूस करना: तांत्रिक हमले या साईकिक अटैक में नकारात्मक शक्तियां व्यक्ति के मन-मस्तिष्क को काबू में करने का प्रयास करती है जिसके चलते व्यक्ति अपनी शक्ति काम नहीं ले पाता और वह अंदर ही अंदर शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोरी महसूस करने लगता है।
(4) रात को डरावने सपने आते हैं: तांत्रिक हमले के दौरान रात को सोते समय भयावह और डरावने सपने आने लगते हैं। कई बार ऎसा लगता है जैसे कि आप पर किसी जानवर ने हमला कर दिया या आप कहीं बहुत ऊंचाई से गिर गए हैं।
(5) पलंग के पास पानी रखने से भी पता चलता है: रात को सोते समय पलंग के पास पानी का एक गिलास रख दें और सोते समय मन में सोचे कि आपके अंदर की नकारात्मक ऊर्जा उस पानी में जा रही है। सुबह उस पानी को किसी छोटे पौधे में डाल दें। ऎसा लगातार आठ दिन तक करें। आठ दिन में वह पौधा मुरझा जाएगा। यदि हमला बहुत तेज हुआ तो पौधा 2-3 दिन में ही कुम्हला जाएगा।
(6) तकिए के नीचे नींबू रखें: फल तथा सब्जियां भी नकारात्मक ऊर्जा से अत्यधिक प्रभावित होते हैं। आप रात को सोते समय एक नींबू अपने तकिए के नीचे रख दें और अपने मन में सोचे कि आपके आस-पास कोई भी नकारात्मक ऊर्जा है तो वह इस नींबू में आ जाएं। तांत्रिक हमला होने की दशा में सुबह आप उस नींबू को मुरझा हुआ पाएंगे। उसका रंग भी काला पड़ जाएगा...

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हर हर महादेव
 6/8/17
15:54
अहमदगढ

बैद्यनाथ ज्योर्तिलिंग.....



इसकी कथा बैद्यनाथ ज्योर्तिलिंग के प्रकट होने से अद्भूत चरित्र वाले चरवाहा बैजू की असीम शिवभक्ति से जुड़ी हुई है। बाबा बैद्यनाथ धाम अपने पीछे एक लंबा इतिहास लिए खड़ा है। ब्रह्म के पौत्र एवं पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा की तीन पत्‍ि‌नयां थी। पहली पत्‍‌नी के गर्भ से धनपति कुबेर, दूसरी पत्‍‌नी द्वारा रावण तथा कुंभकरण तथा तीसरी पत्‍‌नी द्वारा हरिभक्त विभीषण का जन्म हुआ। चारों पुत्रों में से रावण अत्यंत बलवान और बुद्धिमान थे। रावण कैलाश पर्वत पर जाकर शिवजी की तपस्या करने लगे लेकिन बहुत समय बीत जाने के बाद भी शिवजी उन पर प्रसन्न नहीं हुए। बाद में रावण वहां से हट कर हिमालय पर्वत पर पुन: उग्र तपस्या करने लगे फिर भी उन्हें शिव के दर्शन नहीं मिले। यह देख रावण अत्यंत चिंतित हो गए और अपने अपार बल तथा शरीर को धिक्कारने लगे। अब उन्होंने हवन करना आरंभ किया। जब उससे भी शिव जी प्रसन्न नहीं हुए तब उन्होंने सोचा कि अब अपने शरीर को अग्नि में भेंट कर देना चाहिए। ऐसा सोच कर उसने दस मस्तकों में से एक-एक को काट कर अग्नि में हवन करने लगे। जब नौ मस्तक कट चुका और दसवें मस्तक को काटने के लिए तैयार हुए तो शिवजी प्रसन्न होकर उनके समक्ष प्रकट हुए। शिवजी ने उनके हाथ पकड़ लिए और वर मांगने को कहा। शिव की कृपा से उनके सभी मस्तक अपने अपने स्थान से जुड़ गए। हाथ जोड़ कर प्रार्थना करते हुए रावण ने वर मांगा- हे प्रभो! मैं अत्यंत पराक्रमी होना चाहता हूं। आप मेरे नगर में चल कर निवास करें। यह सुन कर शिवजी बोले- हे रावण! तुम हमारे लिंग को उठा कर ले जाओ और इसका पूजन किया करो परंतु यदि तुमने लिंग को मार्ग में कहीं रख दिया तो वह वहीं पर स्थित हो जाएगा।

रावण के कहने पर शिवजी दो रूपों में विभाजित हो गए और दो लिंग स्वरूप धारण किए। रावण उन दोनों शिवलिंगों को कांवर में रख कर चल पड़े। कुछ दूर चलने के बाद रावण को लघुशंका करने की इच्छा हुई। रावण लघुशंका निवारण के लिए अत्यंत व्याकुल हो उठा और किसी व्यक्ति की तलाश करने लगा जो कुछ देर तक कांवर को उठाए रखे। उसी समय वहां एक चरवाहा दिखाई दिया। रावण ने उससे प्रार्थना किया कि कुछ देर तक कांवर को अपने कंधों पर उठाये रखे जिससे मैं लघुशंका कर लूं। चरवाहे ने उत्तर दिया- हे रावण! मैं दो घड़ी इस कांवर को लिए रहूंगा। यदि इस समय के अन्दर तूने कांवर को न लिया तो मैं इसे जमीन पर रख दूंगा। इतना सुन कर रावण उसे कांवर देकर लघुशंका करने बैठ गया। रावण के अहंकार को नष्ट करने के लिए वरूण ने उसका मूत्र इतना अधिक बढ़ा दिया कि उस चरवाहे ने कांवर का भार सहन नहीं कर पाया और कांवर को जमीन पर रख दिया। पृथ्वी पर रखते ही शिवलिंग उसी स्थान पर दृढ़ता पूर्वक जम गए। लघुशंका से उठने के बाद रावण ने उन लिंगों को उठाने का अथक प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हो सका और अंत में निराश होकर घर लौट आया। रावण के चले जाने पर सभी देवताओं ने आकर वहां शिवलिंग की पूजा की। शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें अपना दर्शन दिया और वर मांगने को कहा। सभी देवताओं ने प्रार्थना करते हुए उनसे कहा- हे स्वामी! आप हमें अपनी भक्ति प्रदान करें और कृपा पूर्वक सदैव यहीं स्थित रहें। आप मनुष्यों को वैद्य के समान आनंद प्रदान करने वाले हैं अस्तु आपका नाम बैद्यनाथ है।

अब वह चरवाहा जिसने रावण के कहने पर कांवर उठा कर रखा था नित्यदिन लिंग की पूजा करने लगा। उसका नाम बैजू था। जब तक वह उस लिंग की पूजा नहीं कर लेता तब तक भोजन नहीं किया करता था। अनेक प्रकार के विघ्न आने पर भी उसने अपना नियम कभी नहीं छोड़ा अन्तत: एक दिन उसकी दृढ़ भक्ति को देख कर वामांग में भगवती गिरिजा से सुशोभित शिवजी ने उन्हें दर्शन दिया और उसे वर मांगने को कहा। प्रेम की अधिकता में भर कर उस चरवाहे बैजू ने कहा-हे प्रभु! आपके चरणों में मेरा प्रेम बढ़ता रहे और मैं आपके भक्तों की सेवा किया करूं और आप मेरे नाम से प्रसिद्ध हों। शिवजी एवमस्तु कह कर उस लिंग में प्रवेश कर गए। तब से बाबा बैद्यनाथ को संसार बाबा बैजनाथ के नाम से भी जाना जाने लगा।

हर हर महादेव
 6/8/17
15:54
अहमदगढ